Tuesday, April 24, 2018

सतरें जीवन के - तटस्थ

सतरें जीवन के 

आवाज एक गुनगुना सा सुनाई देने वाला पछतावा है क्योंकि हम हर चीज को आवाज से ही पहचानते है और यह अमिट पहचान जितना जोड़ती है उससे ज्यादा तोड़ती है और यही समभाव हमे अंत मे देह के बाद जिंदा रखता है और हम बने रहने को अभिभप्त होते है जब तक व्योम में गूंज बनी रहती है हमारी


आवाज का स्वाद, रंग और आकार सिर्फ हमी बुझ सकते है क्योंकि हर आवाज का स्वभाव हर बार भिन्न होता है और इसलिए जब एक घुर्राहट से अंतिम आवाज व्योम में गूंजती है तो हम ध्वनि और प्रतिध्वनि के चक्र से निकलकर आकाश में समा जाते है

भीड़ के बीच शोर में जब अंदर से आवाजें उभरने लगती है तो कोलाहल में सिर्फ एक प्रतिध्वनि आती है जो हर बार टकरा कर थोड़ा और शांत करती है और इस तरह से ध्वनि, स्पंदन और चीखों के साथ हम खुद की ही आवाज को खत्म करते है



सन्नाटों के स्वर आवाजों की भिनभिनाहट को पकड़ कर ऐसी दिशा में ले जाते है जहां सब कुछ शांत हो जाता हैं और फिर हम कभी आवाज को दोहरा नही पाते

सोचा था कि 
एक टुकड़ा धूप चुराकर
थोड़ी सी छांव बचा लूंगा 
पर एक बरसात ने 
सब यूँ धो दिया
मानो साँसों पर पहरे 
लगा दिए किसी ने


टूटा तो सब कुछ ही था 
जुड़ने की प्रक्रिया में फिर टूटना जारी रहा 
ऐसा टूटा फिर कि कही कोई संभावना शेष नही रही


साँसों, संघर्ष, संस्तुति, संयम, संजोग और सहजता की कोई भाषा नही होती जैसे जन्म मृत्यु और इनसे उपजी वेदना की कोई भाषा नही होती वैसे ही इनके बिना भी जीवन का कोई अर्थ नही होता - बस एक बहुत बारीक सा तंतु है जो हर समय चैतन्यता में हम पर तारी रहता है बशर्ते हम उसे बूझकर समझ लें और ठीक समय पर कूच करने निकल पड़े


जन्म अगर सुबह है तो धूप उसको पकाने वाली ऊष्मा है जो जीवन को तपाकर सांझ के लिए तैयार करती है, कड़ी धूप में दिनभर तपकर सुस्ताते हुए मद्धम शाम को हम जीवन का लेखा सहेजते है इसलिए कि अब अंधेरी रात में सब समेट कर एक लंबी यात्रा पर निकल जाना है, कोई हड़बड़ी ना हो और भय में हम औचक से ताकते ना रहें गहन अंधियारे को - बस अगली सुबह कही और किसी और ठौर ठिकाने पर


मृत्यु असल मे जन्म से पहले तय है बस हम सिर्फ उसके आने का इंतज़ार करते है, कई बार हम उसके मुहाने पर बैठे बैठे ही जीवन गुजार देते है ठीक ऐसे जैसे दूब के शीर्ष पर बैठी ओंस की बूंदें और झक्क उजाले की एक ही रश्मि किरण के साथ ही सब कुछ क्षण भंगुर हो जाता है

हम सबकी स्मृतियों में मरने वालों की स्मृतियाँ ज्यादा लम्बे और असरदार तरीके से ज़िंदा रहती है और यही वजह है कि हम मौत से खौफ खाते है इसलिए नही कि हम मर जायेंगे, बल्कि इसलिए कि हम स्मृतियों में तब तक रहेंगे जब तक हमें जानने वाले ज़िंदा है
अकेलापन वास्तव में हम ओढ़ते है वस्तुतः हम कभी अकेले नही होते, स्मृतियों की उहापोह के बीच और मन के अंधेरे कोनो के अंतर्द्वंद हमे अकेला नही होने देते और इसी के साथ साथ एक अनवरत यात्रा चलती रहती है - निर्जीव, निरंकुश और निस्तेज जिसमे डूबकर हम वैराग्य का अभिनय करने को बाध्य हो जाते है


अपने अकेलेपन में हम नितांत दयनीय हो जाते है और उस भीड़ को भीतर टटोलते है जो कभी हमे सुहाती नही थी और ठीक इसी प्रस्थान बिंदु से एकालाप और कल्पनाओं की उड़ान शुरू होती है

सारी जिंदगी चाँद के इंतज़ार में बीत सकती है - पूनम या अमावस के चाँद में , बशर्ते सीमाएं आकाश सी चौड़ी हो, खुली हो और इतना स्पेस हो कि एक सांस जाएं तो दूसरी के इंतजार में बेचैनी ना झलकें सफर में
सितारों से भरी रात में सिर्फ चाँद ही सबसे उजला नजर आता है और उसकी चमक ही इस समय सर्वोपरि है - यह उसने लगातार कृष्ण पक्ष में कालिमा से जूझते हुए बनाई है

खुली रात में चाँद के नीचे सोना असल में जागने की पीड़ा है जिसका अंत एक भक्क से होती सुबह में होगा


हर दिन एक सदी के मानिंद होता है जो जीवन के तीनों पड़ावों को लेकर आता है और गहरी रात के समक्ष खत्म होता है, स्मृतियाँ उकेर कर खत्म होता हर दिन एक नए दिन के लिए पुराने का विलोप कर लौटता है - यह लौटना और नए के उदय के बीच जो स्पंदन हम महसूसते है वो ही हमारा सम्बल है जो जीने की उदात्त भावना और खत्म होने के धीर को संजोए रखती है


एक पुराना कंदील सिर्फ इसलिये सभ्यता से बाहर कर दिया जाता है कि अब वह महज एक शो पीस है जिसकी आवश्यकता अब नही रह गई है, यह इस बात का भी प्रतीक है कि हर वस्तु , जीवन का एक समय और उद्देश्य होता है जो वैतरणी की भागम भाग में अपना दायित्व पूर्ण कर पार हो जाना चाहता है


हर बात का अंत अत्यंत जरूरी है - चाहे प्रेम हो या तनाव और मौत से बेहतर कुछ हो ही नही सकता बाकी जो प्रचण्ड और उद्दाम आशाओं में जीवन के स्वप्न और अर्थ देखते है वे मासूम है, उन्हें मालूम ही नही कि जीवन यथार्थ और फेंटेंसी के बीच झूलती कड़वी सच्चाई है
चलते हुए हम सब थकते है - उत्साह, जोश, उद्दाम आशाओं, अनंत सम्भावनाओं और वायवीय परिकल्पनाओं से पर इन्ही सिक्कों के दूसरी ओर सन्तुलन के लिए तनाव, घोर निराशा, कुंठा, ना कर पाने की बेबसी, ठहराव और अस्थायित्व की प्रचण्ड ज्वाला भी साथ चलती है , विचलन और परावर्तन के तार पर इन सबको साधकर जो शेष रहता है वह जीवन है और इसका जो मिला - जुला परिणाम है - वह है अनंत थकान जिसे एक विश्रांति की जरूरत है

मैं सोचता था, मैं चाहता था, मैं ये कर सकता हूँ - ये सब भेद है और दिमाग़ी जालें - इनसे निजात पाये बिना या मैं का त्याग किये बिना कुछ भी सम्भव नही, इस सबको लगातार पोषित करने से मैं को ही हम उत्तुंग शिखर पर ले जाते है और अंत मे पाते है कि मैं निहायत ही एक भोंथरा सा अवयव था समूचे परिदृश्य पर, इसलिये मैं का त्याज्य ही मैं में विगलित हो जाना है अस्तु मैं को मैं में समाहित कर खत्म कर दो

हम भटकते रहते है सर्वत्र और पाते है कि हम ही भटके हुए है मन, वचन, कर्म, वाचा और दृष्टि से, यह आंतरिक भटकाव ही एक तरह की वेदना है जिसे खत्म होना ही चाहिए और अपने को निर्विकार मान कर विलोपित करते हुए अनंतिम की ओर बढ़ना चाहिए ताकि अन्य किसी के लिये स्पेस और अनंत सम्भावनाओं की गुंजाइश बनी रहें

जब सारे मकसद खत्म हो जाये और जीवन का कोई उद्देश्य शेष ना रहें तो मोहमाया का त्याग ही श्रेष्ठ है और एक रास्ता चुनकर उस पर चलना शुरू कर देना चाहिए ताकि गमन को अर्थ मिलें और वह अपने प्रारब्ध पर पहुँचे

ये जो शाख़ें है बची हुई है अब तक - वे भी झिर जाती गर पानी की कुछ लहरें उनकी जड़ों से शीर्ष तक नही पहुंचती तो, कई बार नीचे से उन्मुक्त शिखर पर जाने में समय तो लगता है पर फूल तभी खिलते है


ये जाते हुए फूलों का उदास मौसम है जो तपती धूप की दोपहरी को सहकर गमगीन और चिपचिपी शाम को गुलज़ार करने का भरसक प्रयास करता है पर स्याह रात के अंदेशों की वजह से अनमना होकर रह जाता है



एक पगडंडी, एक समंदर, एक शांत आसमान , एक जीवन से भरा हंसता चेहरा और मलिन क्लान्ति से भरा मौत का घर देखिये, अगर आप जुझ रहे है अपने आप से तो आपको मौत के घर मे पस्त और गमगीन चेहरा सुकून देगा और आप सहज ही विरक्त होकर माया से दूर होता पाएंगे अपने को


शाम को कई बार जल्दी अस्त होना पड़ता है और यह शाम ही जानती है कि एक क्षण के लिए आई बदली उसकी सहज गति पर कितना प्रभाव डालती है, अस्तु वह जूझना भूलकर अपने को अस्त कर लेती है कि यह सब कुछ उसके हिस्से में आने से बचा रहें


जीवन की अंतिम लड़ाई बहुत सहज तरीके से लड़ी जाना चाहिए और इस लड़ने या जूझने की प्रक्रिया में ऐसा ना हो कि मौत भी यूँ आये कि पाँव फिसले किसी तालाब में और आप अनघड़ से खत्म हो जाये


ये जो लौ जल रही है, इसे जलाने की जद्दोजहद में हम सब जिस तरह से जूझ रहे है वह सिर्फ उस तेल के चमत्कार का कमाल है जो ठीक नीचे अँधेरे में बून्द बून्द जलकर स्वाहा हो रहा है और सब कुछ खत्म


जब जीवन की लौ बुझने को हो, हवाएं विपरीत दिशा में उद्दाम वेग से बह रही हो तो जूझने के हजार बहाने मिल सकते है बशर्ते हम सब कुछ विलोपित कर जीवन का मोह छोड़ दें और निर्मोही बन जाएं



जीवन की इस लड़ाई में हमें नही पता कि हम कौन है, खुद ही को नही मालूम कि हम कौन क्यो और कहां है पर फिर भी जूझ रहे है एक स्थाई पहचान के लिए, कोई बताएं कि क्यों






सच तो यह है कि हम सब एक कम्फर्ट ज़ोन में रहना चाहते है और कतराते है बाहर निकलने से , हम सब जूझने से डरते है और डर एक स्थाई भाव है


जीवन मे सृजनात्मकता, सर्जन और बेहद कठिन कार्य भीड़ के बीच भीड़ बनकर ही सम्भव है, जो जूझने से बचकर किसी अभेद्य किले में जाकर अपनी छवि बनाने की नाकाम कोशिश करते है वे कायर है और अकर्मण्य


सफ़र के साथ ही नर्तन, आरोह अवरोह और सुरों का संगम हो सकता है यदि आप यहाँ जूझने के बजाय शास्त्रीयता की ठसक बनाये विशिष्ट बनने की ओर है तो आप जीने का माद्दा ही खो चुके है


जिसे चलते सफ़र, शोर, पंखों की गड़गड़ाहट और पटरियों के बीच संगीत का राग यमन, बाँसुरी पर दरबारी कान्हड़ा, तबले की झपताल सुनाई और समझ आ जाये उसे जूझने की परिभाषा या भाषा की समझ मत सिखाइये


जहाँ मैं खड़ा हूँ वहाँ तक आने के लिए एक लम्बा तपता रेगिस्तान है और सूखे लबों पे मंजिल का नाम लेकर जूझते आना है


रात की चमकीली रोशनी के नीचे खड़े होकर संसार को देखो तो लगता है जीवन के कितने सायों से जूझना अभी बाकी है


उद्दाम वेग से प्रबल होती कुत्सित कामनाओं से निजात पायें बिना क्या हम सच में गतिमान भी हो सकते है, यदि इस ज्वर को नहीं रोक पा रहे तो जाने का मकसद अधूरा है और भयावह भी... मुक्त हो पूर्णरूपेण तभी सत्व निखरेगा जीवन का......


जिद, व्यग्रता, बेचैनी और निस्पृह भाव एक तरह से जाने की आतंरिक तैयारी का हिस्सा है जो लम्बे अभ्यास से आता है और इसके चलते हम जाने के प्रारब्ध को निश्चित करते है ..जिद करो और अपने को बदलो......


पूर्णमासी के चाँद का भी आज से क्षरण आरम्भ हो गया है, कल जितना मोहक था आज थोड़ा दुर्बल है- जाने में दुर्बलता होना स्वाभविक है पर इसी से तो पार पाना है ...


जाने में तो देखा है कि हम अपने को टटोलने के बजाय विहंगम दृष्टि से परिवेश को देखते है जबकि होना तो यह चाहिए कि हम अपने होने का एहसास करें तो संभवत निकल पायेंगे यहाँ से ...


सहानुभूति, सहृदयता, भावनाओं में रहकर जाया नहीं जाता -निर्मोही बनकर जब जाते है तो जाने का प्रतिसाद मिलता है जाओ तो ख्याल रखना इसका ..


बहुत बन्धन बना लिए थे तुमने इस छोटी सी कोख से कब्र की यात्रा में, कहते है जाने से पहले सब यही छोड़ना होते है साथ किसी को ले जाते नही देखा तो आत्मा का बोझ भी छोड़ जाना इसी जगह ताकि कुछ फूल उग सकें और महकते रहो हरदम.....


धीर गम्भीर चित्त से विचारना एक बार बहुत सारी दुनियावी बातों के साथ कि जाने के पहले क्या परम पद पा लिया है, हम सब बहुत सामान्य मनुष्य है पर वहाँ तो सब एक ही है ना, जाते हुए भजना मत गुनना बस...

एकांत में कितना एकाग्र हो पाते है हम, याद आते है वे सब चले जाने वाले जो रास्तों को पार कर अनंत यात्रा पर निकल गए हैं - जाते हुए दृढ़ भरोसा रखना मन में कि लौटना होगा नही अब...




दहकती हुई दोपहर के बाद ढलती शाम को चित्त शांत होता है, मन के दर्पण को साफ कर हम निहारते है कि यह दिन दीन बनाकर जा रहा है पर क्या हम अभिमान से दूर जा पाते है ...


जाओ तो ऐसे कि सब कुछ छोड़ दो, नए का संधान करो और फिर लौटकर आओ तो एक नए धर्म, दर्शन और जीवन पद्धति को लेकर लौटो - जो विज्ञान सम्मत हो, व्यवहारिक हो और संसार मे बोधिवृक्ष की भांति फैलता ही रहें सदैव


ये जाती हुई शाम हरी पत्तियों को भी गहरे काले रंग में डुबो जाती है तो सोचो हमारी आत्मा के कोनो को कितना कालिख से मल जाती होगी, जाते हुए सोचना...

बन्धन तोड़ने तो होते ही है - सिद्धार्थ गए, महावीर गए, गए अनेकानेक - तभी सार्थक हुआ जा ना, नही जाएंगे तो धरा का भार बढ़ेगा और फिर रहने की सार्थकता भी अब नही है ना - कुछ भला है तो जा ना



जाता कौन नही पक्षी भी पशु भी, झर जाती है पत्तियाँ, फूल भी महक पसराकर चले ही जाते है - बहुत छोटा होता है इन सबका काल, साठ सत्तर बरस के कालखण्ड के बाद भी जाने के नाम पर हम उदास हो जाते है

शाम के उजाले को सूरज के साथ जाते देखता हूँ, भोर में शुक्र तारे को जाते देखता हूँ, फिर तारों को चाँद के साथ जाते देखता हूँ , जाने को देखने की आदत सी हो गई हों मानो

जैसे जैसे चाँद अपने शबाब पर आ रहा है वैसे वैसे जाने की बेला समीप आ रही है, क्योकि पूर्णता पतन की भी शुरुवात है ना

धूप में गुजरे है जो उन्हें दरख्तों से कोई वास्ता नहीं 

जाने में बहुत कुछ जा सकता है वो सब भी जो जाने के सर्ग पर उदात्त भाव और उदास मन से विदा देने दूर-दूर से आये होते है पर वे भी जाने की बेला में जाने का स्वांग कर औचक से रह जाते है....

जाना सभी को है कल,आज या अभी पर जैसे कोई जाता है वैसे सब ले जाये समेटकर अपना सब कुछ, थोड़ा सा कुछ भी छुटा बहुत तकलीफ देता है ....

जाना था तो जगह खाली कर जाना था, अभी तक यही कही थे और अचानक से रात और दिन के बीच जा ना हो गया, जगह तो नही गई....

चले ही जाना एक बार सब कुछ छोड़कर - मोहमाया सभी कामनाएं और बिछोह का गुनगुना दर्द - क्योकि छोड़ने में ही लगेगा कि कुछ जुड़ा था, अंतर्मन की गांठों से बेचैन सा.......


देखना यह कि कैसे हम अपने को पूरा निचोड़ कर निकल सकते है यह जानना जाने से पहले बहुत जरुरी है, बचे भी ना रहें और निकल भी जाएँ ऐसे मानो कभी आये ही ना थे..........


जाते हुए खुले मन से जाना, बहुत आहिस्ते से - दिन की धूप ने जगह जगह मिट्टी को भुरभुरा कर सूखा दिया है, जाते हुए मन अक्सर गीला रह जाता है और मिटटी सब सोख लेती है




सांझ जब ढलती है तो दिन भर की दुश्वारियां याद आती है, जाओ तो इन्हें हमेशा के लिए यही छोड़ जाना - मै रात को इनसे जुझूँगा



सुबह से निकली धूप भी तेज चमक के बाद ठंडी होकर जा रही है, जाओ तो ऐसे ही - शांत चित्त से जाओगे तभी कल उजले होकर खिलोगे

जब ढलती शाम का अँधियारा जाती धूप को देखकर मुस्कुराता है तो शाम और गहरा जाती है, जाना तो धूप -अँधेरों के बीच मुस्कुराते हुए

सूरज भी जाते जाते थकते हुए बहुत ठंडा हो जाता है, आसमान की लालिमा में छुपकर घुप्प हो जाता है, जाओ तो लालिमा देकर जाना

मौसम बदलने से दिन लम्बे हो जाते है और रास्तों पर भी परछाई दिखती है इसकी, जाओ तो तुम्हारी परछाई के पार छोड़ जाना एक टुकड़ा अपना


जाती हुई सूरज की रश्मियां चुभती भी है पर आत्मा के उस पोर के लिए जरूरी भी है जो दीप्त रखती है, जाओ तो रश्मि-किरण बन जाना

सोचे बिना कुछ शब्द बोलना ऐसे कि वे दीवारों को अभेद्य किले बना दें, जाने से पहले शब्दों की लड़ी छोड़ जाना, दीवारों पर महकते हुए लटकेगी

एक बार अपनी इच्छाओं और कामनाओं को टटोल लेना जाने से पहले, अतृप्त होकर जाने को जाना नही कहते

जब जाना ही है तो सब कुछ छोड़ दो, इसी से शायद कुछ छूट जाए और ठहरना स्थगित हो जाये

जाना है तो एकदम से चले जाओ रुक रुककर जाने से जो तड़फ होती है उससे पूरी धरा को तकलीफ होती है

जाने के लिए मन से तैयारी करनी होती है , शरीर का नही आत्मा के पोर पोर को जाना होता है सिर्फ भौतिक रूप से जाना नही होता

जाते हुए मुस्कुराकर जाना और मराठियों की तरह यह कहना कि जल्दी आता हूँ - येतो, जातो नही

चांद अनंतकाल से जा रहा है हर बार पुरा आसमान समेटकर ले जाता है पर लौटकर धवल हो जाता है, जाना तो चांद की तरह

ऐसे जाना कि स्तब्ध ना हो यहां के फूल और पत्तियाँ, कांटों को देखा है अक्सर दुखी इसलिए भी कि लोग छिटककर दूर चले जाते है , पछताती तो जड़े भी है

कांकड़ की उस दूब को भी कहकर जाना जो अक्षत बनकर हमेशा से झूमती रही, गीली मिट्टी में धंस गई है पर उसने देखा है कि लौटा नही कोई जाकर

दिन, माह या वर्ष खत्म नही होते - वे याद आने - जाने के दुष्चक्र है, इसलिए इन्हें यही छोड़कर जाना वरना यही रह जाओगे

इच्छाओं का कोई छोर नही और जब जाते है तो ये प्रबल होती है, दमित करके ही पार पाया जा सकता है इनसे

जाने के लिए बहुत सोचने की जरूरत नही बस 'जा ना' एक क्रिया है और इसे ही मानो 'नि क ल' जाओ, सोचने से कमजोरी आती है

जब जाना ही है तो सब समेट लो अपने पास और रख लो सम्हालकर, असल में यहाँ भी धरे रह जाओगे तो बिखरोगे ही ज्यादा , टूटे ही हो वैसे - यहाँ और वहाँ में टूट जाओगे...

जाते हुए पलटकर देखना सिर्फ एक प्रतिक्रिया है कि अब संभव ना हो यह सब फिर, फिर भी लौटना कम से कम एक बार पूरे के पूरे.......

जाने के बाद फिर दुश्चिंताएं भी छुट ही जाती है जैसे सूखी नदी में रेत नहीं चमकती कभी

कह के जाओ कही तो फिर लौट कर मत आना, आने से उम्मीदें बढ़ जाती है

[ तटस्थ ]

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