Tuesday, April 24, 2018

सतरें जीवन के - तटस्थ

सतरें जीवन के 


धुंध और बरसात की बूंदों के बीच ही जीवन का सार छुपा है - बस यही से होकर गुजरना है और इस सबको समझने में जो समय लग गया, लग गया - अब तो बस सब छोड़ कर निश्चित हो जाना है और सचेत और सम्यक भाव में निबद्ध होकर तटस्थ हो जाना है

एक ढलती शाम का दर्द ही असली जीवन का राग द्वैष है और साजो सामान, जब यह समझ मे आ जाये तो फिर अद्वितीयजन्य कर सकोगे और प्रतिग्रहीत कर पाओगे कि जीवन का समपार्श्विक हिस्सा प्रतिक्षण प्रविरत हो रहा है , अर्थान्वयन पर अवलम्बित सुर यवनिका में बज रहे हैं

दुनिया की भीड़ से जितनी दूर रहो उतने ही अपने पास रहोगे और कुछ कर पाओगे अन्यथा एक मखौल बनकर रह जाना और विदा हो जाना कोई जीवन तो नही जबकि आपके पास समय बिल्कुल कम हो

रंग उदासियों की शरणगाह है जहां वे अपनी नाराजगी, गुस्सा, क्षोभ और अवसाद छोड़कर घुल जाते है, सहज होकर जीवन के झंझावातों से मुक्त हो जाती है

नाराज़ होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है और यदि आप किसी से नाराज़ है तो यकीन मानिए वो कोई अपना ही होगा जिससे आप भयानक नाराज़ है - बशर्ते वो आपको अपना मानें

जीवन में अधिकांश चीजें दुविधा में डाल देती है और इस सबमे खत्म भी हो जाती है पर मोह और त्याग के बीच हम संशय में रहते है और इस तरह अपने आप को नित्य तिरोहित करते हुए एक दिन निस्पृह से हो जाते है


जब एक लम्बी नींद लेनी ही है तो क्षणिक झपकियों का क्या आनंद लेना

इंतज़ार करिये - एक लम्बी शाश्वत नींद आपकी ओर बढ़ रही है



नेह की छोटी सी कुण्डी ने दुनिया की वृहत्तर दीवार को बचाये रख्खा है जो रोज कुचक्र रचकर जीवन का विध्वंस करना जानती है


आसमान से आगे कुछ तो होगा ही पर ना नज़र जा पाती है ना सोच , बस हम अपने में ही सिमट कर रह जाते है , यही से हम और आसमान का फर्क बहुत बारीक सी रेखा में बंट जाता है - यह बंटना ही जीवन का स्थूल और साक्ष्य है जो हर पल हमें बिसारना है और ऊँचा होते जाना है


आसमान से आगे कुछ तो होगा ही पर ना नज़र जा पाती है ना सोच , बस हम अपने में ही सिमट कर रह जाते है , यही से हम और आसमान का फर्क बहुत बारीक सी रेखा में बंट जाता है - यह बंटना ही जीवन का स्थूल और साक्ष्य है जो हर पल हमें बिसारना है और ऊँचा होते जाना है

भाषा और लेखन की तरह जीवन भी सम्भावनाओं से भरा है, अबाध है और वेगमयी भी - सदैव उद्दाम और जल्दी में, हड़बड़ाहट में , अनिश्चितता से भरा, इसलिए मैं ना लेखन और भाषा में - ना ही जीवन मे "पूर्ण विराम" जैसा विराम चिन्ह इस्तेमाल करने के प्रयोगों का पक्षधर हूँ

हमेंशा खुला रहता हूँ और लेखन में पूर्ण विराम नही लगाता, पता नही कब , कहाँ, कैसे, कही भी कुछ कौंध जाएं - एक नई और निस्पृह - नवाचारी शुरुआत के लिए सतत खुली, चाहे निर्मम भी हो- आकाशभर और उन्मुक्त जगह रहनी ही चाहिए
थका हुआ दिख रहा था , बहुत दिनों बाद मिला वो - एक जमाने मे बेहद चर्चित, संघर्षशील और जुझारू शख्स था इधर जब से आंदोलन और धरने रैलियां बन्द हो गई वह भी बेरोजगार हो गया है
दो तीन संस्थाओं से भी जुड़ा पर कुल मिलाकर हासिल शून्य रहा, अधिकारियों से दोस्ती भी काम नही आ रही अब , जगह जगह छलनी शरीर और आत्मा का सिसकता दर्द लिए वह हर कही नजर आने लगा
हर ओटले और ओसारे पर कतराए हुए लोग उससे भागते और साथ रही स्त्रियां भी उसे और उसके हर भोगे हुए संसर्ग को विलोपित कर नए की तलाश में सम्भावनाएं टटोल रही थी , साथ में जेल गए ज्ञान दिया वे ही अब कन्नी काटते है और उसे निरापद मानते थे

रोटी का सहारा भी इधर ख़त्म हो गया था पर अब ना घर में कोई सम्भावनाएँ थी ना ही बाहर , बस अब कहानियाँ थी और क़िस्से पर उन्हें सुनने वाला कोई ना था

जाहिर है वह बेहद निराश और टूटा हुआ हर जगह अपनी असफ़लता और यायावरी की पुरानी कहानियां सुनाता रहता है और हर जगह से थका हारा लौटता है घर
शाम की तलाश में फिर डूबता है झील में और रात भर बेचैन रहता है कि कल कहां जाना होगा और सुबह उठकर अख़बार में शहर में आज होने वाले कार्यक्रमों की सूची जी भरकर देखता है
जब बहुत तनाव हो तो जीवन को ढीला छोड़ दो और सिर्फ उन बातों का और शख्सियतों के विशुद्ध मजे लो जो आपको तनाव दे रहें हो


जिम्मेदारियां इंसान को बांधती नही बल्कि मजबूर करती है कि वह स्वाभाविक जीना छोड़कर उलझता रहे और एक दिन उसी में गुत्थम गुत्था होकर सांस छोड़ दे , बेहतर है कि एक झटके में सब तोड़कर उन्मुक्त हुआ जाए


हर मौत जीवन की उम्मीदों, उदण्ड आशाओं और उद्दाम वेग से प्रबल होती महत्वकांक्षाओं के खिलाफ एक महती गवाही है जो अनंतिम रूप से सत्य है

उदास शामें सुप्त और ढलते जा रहे जीवन की माशुकाएँ है जो रात ढलने तक कवच जैसी बनी रहती है

जिस पथ पर जाना है वहां बादलों के सिवा कुछ नहीं, यह धरती है जिसकी कोई सीमा नहीं और रास्ते ऐसे ही मानो जिनका कोई ठौर नहीं, बस यूं ही गुजरते - गुजरते अब सब कुछ खत्म हो रहा है - जीने का मकसद, सांस लेने की तरीके, जिंदा रहने की आहट और चुपचाप चली आ रही है वह पदचाप जिसे सुनकर मैं चौक जाता हूँ और बारंबार लगता है कि कहीं और अब जाया न जाए, कहीं और चला ना जाए, पथ सारे दुर्गम हो चले हैं, खत्म हो गए हैं वे रास्ते और धूप आसमान, छाँह, ओस की बूंदें, रक्तिम आभा, स्नेहिल लाली, भाषा के मुहावरें और रक्त रंजित से पल तारी हो रहें है , देख रहा हूँ कि सब खत्म हो गया है - एक भी किरण नजर आती नही दूर क्षितिज तक

भीगती सुबहों के ये फूल एक दिन फ़ल बनेंगें

इस बरसात में उग रही हर कोंपल तुम्हारे लाख प्रयास के बाद भी सफल है, कितनी घास रौंदोंगे, ये सब तुम्हारे ताप से नही अपनी आंतरिक ऊर्जा से स्पंदित है

भीगती सुबहें धूप के इंतज़ार में बैठी अतृप्त आत्माएं है जो सूखकर फुर्र हो जाने को बेताब है


बाहर अभी अभी धुंध में एक पत्ता खिला है दिन और रात के मिलन के ठीक एक घंटे बाद और मैंने उसे देखा खिलते हुए, कल सुबह तक शायद वह बाकी पत्तों की तरह उतना ही हरा हो जाएगा जितने और सब है- बस फर्क रह जायेगा तो इतना कि वह धुंध से उपजा बरसात की एक रात का है और अब उसे भी औरों के संग साथ धूप को सहना होगा

जब हमें लगने लगे कि अब निभाह मुश्किल है और कुछ ठीक नही हो सकता तो यवनिका पर ठिठककर सोचने का अर्थ नही, काले मेघों से आच्छादित धरा पर सब कुछ त्याज्य कर ही आगे बढ़ना होगा और ये मोह के बीच लिपटती जा रही एषणाओं को झटके से तोड़कर निकलना होगा सफ़र पर - सबसे पहले दोस्त छोड़ो, फिर परिजन और अंत मे स्वयं परिव्राजक बनकर निकलो तभी कुछ रच पाओगे ऐसा जो सम्भवतः आत्मा को छू सके


क्योंकि संसार मे उन लोगों की उपस्थिति ज़्यादा है - स्मृतियों में ही सही- जो विदा ले चुके है और कही दूर शांत चित्त से सो रहे है चिर स्थाई भाव से इसलिए मैं अब विचलित नही होता किसी भी हलचल से क्योंकि शनैः शनैः वही जा रहा हूँ और तुम सबको भी वही जाना है इसलिए ज्ञान, अभ्यास और अहम को भी छोड़ते चलो

राजकुमार सिद्धार्थ का घर छोड़ना मेरे लिए आज भी बड़ा सवाल है और इसका जवाब मुझे गया और सारनाथ में भी नही मिला - साँची में भी नही
सवाल उठना और वाजिब समय पर उठाना अपने को शक शुबहा में देखना - जीवन का सत्य होना चाहिए और यह सकारात्मक है और अपने हर गलीज़ से गलीज़ प्रश्न का सिलसिलेवार जवाब खोजना अपने शरीर के साथ आत्मा का पूर्ण बुद्ध हो जाना है
हम सबके भीतर यह एषणा, द्वंद और संघर्ष बना रहे यही सब कुछ है

उजाले अंधेरों में ही समझ आते है
अंधेरों में ही राहें छुपी है जो मंजिलों के पार होकर विलोपित होती है और यह समझने में पूरी रात बीत जाती है और अगर एक जीवन एक रात है तो उजाले सदियों की परछाईयाँ है जो हमें आश्वस्त करती है कि कुछ रास्तें कुछ मिट्टी की गोद मे बनेंगें और फिर उगेंगें कही से नवांकुर

ये उजालों के खेल जीवन के सुप्त में बने रहें और जलती रहें जिन्दगानियाँ कोने कोने पर
वस्तुतः हम कही जाते ही नही है - घर , अपने लोग, स्मृतियाँ, मिलन और नई जगहें हमें अपने अंदर झांकने के मौके देती है कि जो था , जिसे छोड़कर नूतन की तलाश में आये थे वही बेहतर था और हम अपने को समझाते हुए हर बार अपनी जड़ों की ओर लौट आते है कि आओ लौट ही चलें अब कुछ नही गूँथने को और सहेजने को

बस लौट रहा हूँ चार दिन बाद बहुत सारी यादों को सहेजा है और इस सबमे बहुत लोग , मित्र और संगी साथी ज़ेहन में लंबे समय बने रहेंगे


जब भी भीगा इन बारिशों में तो बहुत बहुत सूखा रह गया और जब जब भीगने से बचा तो पोर पोर भीग गया, जीवन के इस स्याह गाढ़े रहस्य को सुलझा नही पा रहा और बरसात है कि फिर जाने को है



गीली हवाओं से पूछो बारिश होने मायने, गीली मिट्टी से पूछो बूंदों के नृत्य की थकान, हरी कोमल पत्तियों से पूछो बादलों के रीत जाने का सुख, जमीन में रिसते पानी से पूछो आत्मा के तृप्त होने का स्वाद और जब कुछ ना पूछ सको तो महसूस करके देखना कितना खाली हो तुम सिर्फ प्यार की एक बूंद के बिना इस धरा पर


मैं काले आसमान से नही डरता क्योकि उसमे उमंग की बूंदे भरी होती है , नीला कभी नीला होता ही नही और इंद्रधनुष भी बेहद क्षणिक है , इसलिए मैं काले बादलों का इंतज़ार करता हूँ - वो उन नेह की बूंदों को लाते है जो जीवन को इंद्रधनुष बना देती है और किसी चीड़ के पेड़ से छनती हुई चांदनी जीवन को निरभ्र सा उजला कर देती है


मैं नींद में बूंदों के साथ भीगता हूँ और फिर सपनों में बारिश के तन पर मिट्टी रौंदकर हवाई किले बनाता हूँ किसी जादूगर की तरह - जिसे जमाने की हकीकतें और सच्चाईयां छुपाकर भरपूर प्यार बांटने की आदत है, अफसोस यही है या यूं कहूँ कि बारिश गोया कम होते जा रही है इन दिनों सच्चे आँसूओं की तरह


बहुत बार सोचा कि बून्द बनूँ , फिर सोचा नदी बनूँ , फिर लगा कि समंदर बन जाऊँ जिसका ठौर नही पर फिर लगा प्यार के लिए बहुत ही थोड़ी सी जगह चाहिए , मेरे लिए ओंस नुमा स्वाति नक्षत्र की एक ही बून्द काफी है


बरसात की बूंदों में भीगकर कुछ और गीला हो जाता हूँ मानो खुद ने खुद को निचोड़ लिया है और सब ओर बह रहा हूँ दिशाहीन सा

रिश्तों का कोई लेखा नही और इसकी बही में सैंकड़ों ऐसे किस्से लिखे है जिनमे कहानियां भाप सी उठती है , आग सी ठंडी होती है और गूंगी होकर भी वाचालता से परे निकल जाती है - सत्व, विरक्ति और किसी निर्गुण सी आसक्ति में डूबी कहानियां ही असल मे हमारा स्थाई भाव है जीवन का , बस यही कड़ी रिश्तों को इतना मजबूत करती है कि वे छन्न से बजकर टूट जाते है

रिश्तें कोई पेड़ पौधे नही जिन्हें पानी से सींचा जाए , इन्हें खून से ही सींचना पड़ता है और अंत मे बहुत निर्मोही होकर छोड़ना पड़ता है तभी उसकी पवित्रता और सहजता बनी रह सकती है

असल मे जन्म के पहले तय हुए रिश्ते तो बेहद मजबूत होते ही है तमाम गिले - शिकवों के बावजूद भी पर जो हमने अपना खून, समय और भावनाएं देकर जो रिश्तें कमाएं या बनाएं उन्ही से हमको अक्सर खतरा बना रहता है

एक उम्र और समय के बाद हम रिश्तें इसलिए बनाते या ढोते है कि ये लोग कम से कम मेरी मैय्यत में आएं और कंधा दें


आवाज एक गुनगुना सा सुनाई देने वाला पछतावा है क्योंकि हम हर चीज को आवाज से ही पहचानते है और यह अमिट पहचान जितना जोड़ती है उससे ज्यादा तोड़ती है और यही समभाव हमे अंत मे देह के बाद जिंदा रखता है और हम बने रहने को अभिभप्त होते है जब तक व्योम में गूंज बनी रहती है हमारी


आवाज का स्वाद, रंग और आकार सिर्फ हमी बुझ सकते है क्योंकि हर आवाज का स्वभाव हर बार भिन्न होता है और इसलिए जब एक घुर्राहट से अंतिम आवाज व्योम में गूंजती है तो हम ध्वनि और प्रतिध्वनि के चक्र से निकलकर आकाश में समा जाते है

भीड़ के बीच शोर में जब अंदर से आवाजें उभरने लगती है तो कोलाहल में सिर्फ एक प्रतिध्वनि आती है जो हर बार टकरा कर थोड़ा और शांत करती है और इस तरह से ध्वनि, स्पंदन और चीखों के साथ हम खुद की ही आवाज को खत्म करते है



सन्नाटों के स्वर आवाजों की भिनभिनाहट को पकड़ कर ऐसी दिशा में ले जाते है जहां सब कुछ शांत हो जाता हैं और फिर हम कभी आवाज को दोहरा नही पाते

सोचा था कि 
एक टुकड़ा धूप चुराकर
थोड़ी सी छांव बचा लूंगा 
पर एक बरसात ने 
सब यूँ धो दिया
मानो साँसों पर पहरे 
लगा दिए किसी ने


टूटा तो सब कुछ ही था 
जुड़ने की प्रक्रिया में फिर टूटना जारी रहा 
ऐसा टूटा फिर कि कही कोई संभावना शेष नही रही




साँसों, संघर्ष, संस्तुति, संयम, संजोग और सहजता की कोई भाषा नही होती जैसे जन्म मृत्यु और इनसे उपजी वेदना की कोई भाषा नही होती वैसे ही इनके बिना भी जीवन का कोई अर्थ नही होता - बस एक बहुत बारीक सा तंतु है जो हर समय चैतन्यता में हम पर तारी रहता है बशर्ते हम उसे बूझकर समझ लें और ठीक समय पर कूच करने निकल पड़े


जन्म अगर सुबह है तो धूप उसको पकाने वाली ऊष्मा है जो जीवन को तपाकर सांझ के लिए तैयार करती है, कड़ी धूप में दिनभर तपकर सुस्ताते हुए मद्धम शाम को हम जीवन का लेखा सहेजते है इसलिए कि अब अंधेरी रात में सब समेट कर एक लंबी यात्रा पर निकल जाना है, कोई हड़बड़ी ना हो और भय में हम औचक से ताकते ना रहें गहन अंधियारे को - बस अगली सुबह कही और किसी और ठौर ठिकाने पर


मृत्यु असल मे जन्म से पहले तय है बस हम सिर्फ उसके आने का इंतज़ार करते है, कई बार हम उसके मुहाने पर बैठे बैठे ही जीवन गुजार देते है ठीक ऐसे जैसे दूब के शीर्ष पर बैठी ओंस की बूंदें और झक्क उजाले की एक ही रश्मि किरण के साथ ही सब कुछ क्षण भंगुर हो जाता है

हम सबकी स्मृतियों में मरने वालों की स्मृतियाँ ज्यादा लम्बे और असरदार तरीके से ज़िंदा रहती है और यही वजह है कि हम मौत से खौफ खाते है इसलिए नही कि हम मर जायेंगे, बल्कि इसलिए कि हम स्मृतियों में तब तक रहेंगे जब तक हमें जानने वाले ज़िंदा है
अकेलापन वास्तव में हम ओढ़ते है वस्तुतः हम कभी अकेले नही होते, स्मृतियों की उहापोह के बीच और मन के अंधेरे कोनो के अंतर्द्वंद हमे अकेला नही होने देते और इसी के साथ साथ एक अनवरत यात्रा चलती रहती है - निर्जीव, निरंकुश और निस्तेज जिसमे डूबकर हम वैराग्य का अभिनय करने को बाध्य हो जाते है


अपने अकेलेपन में हम नितांत दयनीय हो जाते है और उस भीड़ को भीतर टटोलते है जो कभी हमे सुहाती नही थी और ठीक इसी प्रस्थान बिंदु से एकालाप और कल्पनाओं की उड़ान शुरू होती है

सारी जिंदगी चाँद के इंतज़ार में बीत सकती है - पूनम या अमावस के चाँद में , बशर्ते सीमाएं आकाश सी चौड़ी हो, खुली हो और इतना स्पेस हो कि एक सांस जाएं तो दूसरी के इंतजार में बेचैनी ना झलकें सफर में

सितारों से भरी रात में सिर्फ चाँद ही सबसे उजला नजर आता है और उसकी चमक ही इस समय सर्वोपरि है - यह उसने लगातार कृष्ण पक्ष में कालिमा से जूझते हुए बनाई है

खुली रात में चाँद के नीचे सोना असल में जागने की पीड़ा है जिसका अंत एक भक्क से होती सुबह में होगा


हर दिन एक सदी के मानिंद होता है जो जीवन के तीनों पड़ावों को लेकर आता है और गहरी रात के समक्ष खत्म होता है, स्मृतियाँ उकेर कर खत्म होता हर दिन एक नए दिन के लिए पुराने का विलोप कर लौटता है - यह लौटना और नए के उदय के बीच जो स्पंदन हम महसूसते है वो ही हमारा सम्बल है जो जीने की उदात्त भावना और खत्म होने के धीर को संजोए रखती है


एक पुराना कंदील सिर्फ इसलिये सभ्यता से बाहर कर दिया जाता है कि अब वह महज एक शो पीस है जिसकी आवश्यकता अब नही रह गई है, यह इस बात का भी प्रतीक है कि हर वस्तु , जीवन का एक समय और उद्देश्य होता है जो वैतरणी की भागम भाग में अपना दायित्व पूर्ण कर पार हो जाना चाहता है


हर बात का अंत अत्यंत जरूरी है - चाहे प्रेम हो या तनाव और मौत से बेहतर कुछ हो ही नही सकता बाकी जो प्रचण्ड और उद्दाम आशाओं में जीवन के स्वप्न और अर्थ देखते है वे मासूम है, उन्हें मालूम ही नही कि जीवन यथार्थ और फेंटेंसी के बीच झूलती कड़वी सच्चाई है
चलते हुए हम सब थकते है - उत्साह, जोश, उद्दाम आशाओं, अनंत सम्भावनाओं और वायवीय परिकल्पनाओं से पर इन्ही सिक्कों के दूसरी ओर सन्तुलन के लिए तनाव, घोर निराशा, कुंठा, ना कर पाने की बेबसी, ठहराव और अस्थायित्व की प्रचण्ड ज्वाला भी साथ चलती है , विचलन और परावर्तन के तार पर इन सबको साधकर जो शेष रहता है वह जीवन है और इसका जो मिला - जुला परिणाम है - वह है अनंत थकान जिसे एक विश्रांति की जरूरत है

मैं सोचता था, मैं चाहता था, मैं ये कर सकता हूँ - ये सब भेद है और दिमाग़ी जालें - इनसे निजात पाये बिना या मैं का त्याग किये बिना कुछ भी सम्भव नही, इस सबको लगातार पोषित करने से मैं को ही हम उत्तुंग शिखर पर ले जाते है और अंत मे पाते है कि मैं निहायत ही एक भोंथरा सा अवयव था समूचे परिदृश्य पर, इसलिये मैं का त्याज्य ही मैं में विगलित हो जाना है अस्तु मैं को मैं में समाहित कर खत्म कर दो

हम भटकते रहते है सर्वत्र और पाते है कि हम ही भटके हुए है मन, वचन, कर्म, वाचा और दृष्टि से, यह आंतरिक भटकाव ही एक तरह की वेदना है जिसे खत्म होना ही चाहिए और अपने को निर्विकार मान कर विलोपित करते हुए अनंतिम की ओर बढ़ना चाहिए ताकि अन्य किसी के लिये स्पेस और अनंत सम्भावनाओं की गुंजाइश बनी रहें

जब सारे मकसद खत्म हो जाये और जीवन का कोई उद्देश्य शेष ना रहें तो मोहमाया का त्याग ही श्रेष्ठ है और एक रास्ता चुनकर उस पर चलना शुरू कर देना चाहिए ताकि गमन को अर्थ मिलें और वह अपने प्रारब्ध पर पहुँचे

ये जो शाख़ें है बची हुई है अब तक - वे भी झिर जाती गर पानी की कुछ लहरें उनकी जड़ों से शीर्ष तक नही पहुंचती तो, कई बार नीचे से उन्मुक्त शिखर पर जाने में समय तो लगता है पर फूल तभी खिलते है


ये जाते हुए फूलों का उदास मौसम है जो तपती धूप की दोपहरी को सहकर गमगीन और चिपचिपी शाम को गुलज़ार करने का भरसक प्रयास करता है पर स्याह रात के अंदेशों की वजह से अनमना होकर रह जाता है



एक पगडंडी, एक समंदर, एक शांत आसमान , एक जीवन से भरा हंसता चेहरा और मलिन क्लान्ति से भरा मौत का घर देखिये, अगर आप जुझ रहे है अपने आप से तो आपको मौत के घर मे पस्त और गमगीन चेहरा सुकून देगा और आप सहज ही विरक्त होकर माया से दूर होता पाएंगे अपने को


शाम को कई बार जल्दी अस्त होना पड़ता है और यह शाम ही जानती है कि एक क्षण के लिए आई बदली उसकी सहज गति पर कितना प्रभाव डालती है, अस्तु वह जूझना भूलकर अपने को अस्त कर लेती है कि यह सब कुछ उसके हिस्से में आने से बचा रहें


जीवन की अंतिम लड़ाई बहुत सहज तरीके से लड़ी जाना चाहिए और इस लड़ने या जूझने की प्रक्रिया में ऐसा ना हो कि मौत भी यूँ आये कि पाँव फिसले किसी तालाब में और आप अनघड़ से खत्म हो जाये


ये जो लौ जल रही है, इसे जलाने की जद्दोजहद में हम सब जिस तरह से जूझ रहे है वह सिर्फ उस तेल के चमत्कार का कमाल है जो ठीक नीचे अँधेरे में बून्द बून्द जलकर स्वाहा हो रहा है और सब कुछ खत्म


जब जीवन की लौ बुझने को हो, हवाएं विपरीत दिशा में उद्दाम वेग से बह रही हो तो जूझने के हजार बहाने मिल सकते है बशर्ते हम सब कुछ विलोपित कर जीवन का मोह छोड़ दें और निर्मोही बन जाएं



जीवन की इस लड़ाई में हमें नही पता कि हम कौन है, खुद ही को नही मालूम कि हम कौन क्यो और कहां है पर फिर भी जूझ रहे है एक स्थाई पहचान के लिए, कोई बताएं कि क्यों






सच तो यह है कि हम सब एक कम्फर्ट ज़ोन में रहना चाहते है और कतराते है बाहर निकलने से , हम सब जूझने से डरते है और डर एक स्थाई भाव है


जीवन मे सृजनात्मकता, सर्जन और बेहद कठिन कार्य भीड़ के बीच भीड़ बनकर ही सम्भव है, जो जूझने से बचकर किसी अभेद्य किले में जाकर अपनी छवि बनाने की नाकाम कोशिश करते है वे कायर है और अकर्मण्य


सफ़र के साथ ही नर्तन, आरोह अवरोह और सुरों का संगम हो सकता है यदि आप यहाँ जूझने के बजाय शास्त्रीयता की ठसक बनाये विशिष्ट बनने की ओर है तो आप जीने का माद्दा ही खो चुके है


जिसे चलते सफ़र, शोर, पंखों की गड़गड़ाहट और पटरियों के बीच संगीत का राग यमन, बाँसुरी पर दरबारी कान्हड़ा, तबले की झपताल सुनाई और समझ आ जाये उसे जूझने की परिभाषा या भाषा की समझ मत सिखाइये


जहाँ मैं खड़ा हूँ वहाँ तक आने के लिए एक लम्बा तपता रेगिस्तान है और सूखे लबों पे मंजिल का नाम लेकर जूझते आना है


रात की चमकीली रोशनी के नीचे खड़े होकर संसार को देखो तो लगता है जीवन के कितने सायों से जूझना अभी बाकी है


उद्दाम वेग से प्रबल होती कुत्सित कामनाओं से निजात पायें बिना क्या हम सच में गतिमान भी हो सकते है, यदि इस ज्वर को नहीं रोक पा रहे तो जाने का मकसद अधूरा है और भयावह भी... मुक्त हो पूर्णरूपेण तभी सत्व निखरेगा जीवन का......


जिद, व्यग्रता, बेचैनी और निस्पृह भाव एक तरह से जाने की आतंरिक तैयारी का हिस्सा है जो लम्बे अभ्यास से आता है और इसके चलते हम जाने के प्रारब्ध को निश्चित करते है ..जिद करो और अपने को बदलो......


पूर्णमासी के चाँद का भी आज से क्षरण आरम्भ हो गया है, कल जितना मोहक था आज थोड़ा दुर्बल है- जाने में दुर्बलता होना स्वाभविक है पर इसी से तो पार पाना है ...


जाने में तो देखा है कि हम अपने को टटोलने के बजाय विहंगम दृष्टि से परिवेश को देखते है जबकि होना तो यह चाहिए कि हम अपने होने का एहसास करें तो संभवत निकल पायेंगे यहाँ से ...


सहानुभूति, सहृदयता, भावनाओं में रहकर जाया नहीं जाता -निर्मोही बनकर जब जाते है तो जाने का प्रतिसाद मिलता है जाओ तो ख्याल रखना इसका ..


बहुत बन्धन बना लिए थे तुमने इस छोटी सी कोख से कब्र की यात्रा में, कहते है जाने से पहले सब यही छोड़ना होते है साथ किसी को ले जाते नही देखा तो आत्मा का बोझ भी छोड़ जाना इसी जगह ताकि कुछ फूल उग सकें और महकते रहो हरदम.....


धीर गम्भीर चित्त से विचारना एक बार बहुत सारी दुनियावी बातों के साथ कि जाने के पहले क्या परम पद पा लिया है, हम सब बहुत सामान्य मनुष्य है पर वहाँ तो सब एक ही है ना, जाते हुए भजना मत गुनना बस...

एकांत में कितना एकाग्र हो पाते है हम, याद आते है वे सब चले जाने वाले जो रास्तों को पार कर अनंत यात्रा पर निकल गए हैं - जाते हुए दृढ़ भरोसा रखना मन में कि लौटना होगा नही अब...




दहकती हुई दोपहर के बाद ढलती शाम को चित्त शांत होता है, मन के दर्पण को साफ कर हम निहारते है कि यह दिन दीन बनाकर जा रहा है पर क्या हम अभिमान से दूर जा पाते है ...


जाओ तो ऐसे कि सब कुछ छोड़ दो, नए का संधान करो और फिर लौटकर आओ तो एक नए धर्म, दर्शन और जीवन पद्धति को लेकर लौटो - जो विज्ञान सम्मत हो, व्यवहारिक हो और संसार मे बोधिवृक्ष की भांति फैलता ही रहें सदैव


ये जाती हुई शाम हरी पत्तियों को भी गहरे काले रंग में डुबो जाती है तो सोचो हमारी आत्मा के कोनो को कितना कालिख से मल जाती होगी, जाते हुए सोचना...

बन्धन तोड़ने तो होते ही है - सिद्धार्थ गए, महावीर गए, गए अनेकानेक - तभी सार्थक हुआ जा ना, नही जाएंगे तो धरा का भार बढ़ेगा और फिर रहने की सार्थकता भी अब नही है ना - कुछ भला है तो जा ना



जाता कौन नही पक्षी भी पशु भी, झर जाती है पत्तियाँ, फूल भी महक पसराकर चले ही जाते है - बहुत छोटा होता है इन सबका काल, साठ सत्तर बरस के कालखण्ड के बाद भी जाने के नाम पर हम उदास हो जाते है

शाम के उजाले को सूरज के साथ जाते देखता हूँ, भोर में शुक्र तारे को जाते देखता हूँ, फिर तारों को चाँद के साथ जाते देखता हूँ , जाने को देखने की आदत सी हो गई हों मानो

जैसे जैसे चाँद अपने शबाब पर आ रहा है वैसे वैसे जाने की बेला समीप आ रही है, क्योकि पूर्णता पतन की भी शुरुवात है ना

धूप में गुजरे है जो उन्हें दरख्तों से कोई वास्ता नहीं 

जाने में बहुत कुछ जा सकता है वो सब भी जो जाने के सर्ग पर उदात्त भाव और उदास मन से विदा देने दूर-दूर से आये होते है पर वे भी जाने की बेला में जाने का स्वांग कर औचक से रह जाते है....

जाना सभी को है कल,आज या अभी पर जैसे कोई जाता है वैसे सब ले जाये समेटकर अपना सब कुछ, थोड़ा सा कुछ भी छुटा बहुत तकलीफ देता है ....

जाना था तो जगह खाली कर जाना था, अभी तक यही कही थे और अचानक से रात और दिन के बीच जा ना हो गया, जगह तो नही गई....

चले ही जाना एक बार सब कुछ छोड़कर - मोहमाया सभी कामनाएं और बिछोह का गुनगुना दर्द - क्योकि छोड़ने में ही लगेगा कि कुछ जुड़ा था, अंतर्मन की गांठों से बेचैन सा.......


देखना यह कि कैसे हम अपने को पूरा निचोड़ कर निकल सकते है यह जानना जाने से पहले बहुत जरुरी है, बचे भी ना रहें और निकल भी जाएँ ऐसे मानो कभी आये ही ना थे..........


जाते हुए खुले मन से जाना, बहुत आहिस्ते से - दिन की धूप ने जगह जगह मिट्टी को भुरभुरा कर सूखा दिया है, जाते हुए मन अक्सर गीला रह जाता है और मिटटी सब सोख लेती है




सांझ जब ढलती है तो दिन भर की दुश्वारियां याद आती है, जाओ तो इन्हें हमेशा के लिए यही छोड़ जाना - मै रात को इनसे जुझूँगा



सुबह से निकली धूप भी तेज चमक के बाद ठंडी होकर जा रही है, जाओ तो ऐसे ही - शांत चित्त से जाओगे तभी कल उजले होकर खिलोगे

जब ढलती शाम का अँधियारा जाती धूप को देखकर मुस्कुराता है तो शाम और गहरा जाती है, जाना तो धूप -अँधेरों के बीच मुस्कुराते हुए

सूरज भी जाते जाते थकते हुए बहुत ठंडा हो जाता है, आसमान की लालिमा में छुपकर घुप्प हो जाता है, जाओ तो लालिमा देकर जाना

मौसम बदलने से दिन लम्बे हो जाते है और रास्तों पर भी परछाई दिखती है इसकी, जाओ तो तुम्हारी परछाई के पार छोड़ जाना एक टुकड़ा अपना


जाती हुई सूरज की रश्मियां चुभती भी है पर आत्मा के उस पोर के लिए जरूरी भी है जो दीप्त रखती है, जाओ तो रश्मि-किरण बन जाना

सोचे बिना कुछ शब्द बोलना ऐसे कि वे दीवारों को अभेद्य किले बना दें, जाने से पहले शब्दों की लड़ी छोड़ जाना, दीवारों पर महकते हुए लटकेगी

एक बार अपनी इच्छाओं और कामनाओं को टटोल लेना जाने से पहले, अतृप्त होकर जाने को जाना नही कहते

जब जाना ही है तो सब कुछ छोड़ दो, इसी से शायद कुछ छूट जाए और ठहरना स्थगित हो जाये

जाना है तो एकदम से चले जाओ रुक रुककर जाने से जो तड़फ होती है उससे पूरी धरा को तकलीफ होती है

जाने के लिए मन से तैयारी करनी होती है , शरीर का नही आत्मा के पोर पोर को जाना होता है सिर्फ भौतिक रूप से जाना नही होता

जाते हुए मुस्कुराकर जाना और मराठियों की तरह यह कहना कि जल्दी आता हूँ - येतो, जातो नही

चांद अनंतकाल से जा रहा है हर बार पुरा आसमान समेटकर ले जाता है पर लौटकर धवल हो जाता है, जाना तो चांद की तरह

ऐसे जाना कि स्तब्ध ना हो यहां के फूल और पत्तियाँ, कांटों को देखा है अक्सर दुखी इसलिए भी कि लोग छिटककर दूर चले जाते है , पछताती तो जड़े भी है

कांकड़ की उस दूब को भी कहकर जाना जो अक्षत बनकर हमेशा से झूमती रही, गीली मिट्टी में धंस गई है पर उसने देखा है कि लौटा नही कोई जाकर

दिन, माह या वर्ष खत्म नही होते - वे याद आने - जाने के दुष्चक्र है, इसलिए इन्हें यही छोड़कर जाना वरना यही रह जाओगे

इच्छाओं का कोई छोर नही और जब जाते है तो ये प्रबल होती है, दमित करके ही पार पाया जा सकता है इनसे

जाने के लिए बहुत सोचने की जरूरत नही बस 'जा ना' एक क्रिया है और इसे ही मानो 'नि क ल' जाओ, सोचने से कमजोरी आती है

जब जाना ही है तो सब समेट लो अपने पास और रख लो सम्हालकर, असल में यहाँ भी धरे रह जाओगे तो बिखरोगे ही ज्यादा , टूटे ही हो वैसे - यहाँ और वहाँ में टूट जाओगे...

जाते हुए पलटकर देखना सिर्फ एक प्रतिक्रिया है कि अब संभव ना हो यह सब फिर, फिर भी लौटना कम से कम एक बार पूरे के पूरे.......

जाने के बाद फिर दुश्चिंताएं भी छुट ही जाती है जैसे सूखी नदी में रेत नहीं चमकती कभी

कह के जाओ कही तो फिर लौट कर मत आना, आने से उम्मीदें बढ़ जाती है

[ तटस्थ ]

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