Thursday, April 12, 2018

KhariKhari Includes Poetry Corner and National Fast 8 to 12 April 2018

हम चमकना चाहते है देर तक
हमने अपनी रोशनी हल्की रखी है

[धीरज चौहान]


कल के नाटक का ठीकरा विपक्ष पर फोड़ने के पहले जवाब दें महोदय :-
1 अविश्वास प्रस्ताव क्यों नही लाने दिया आपने?
२- बहस से क्यों बचते रहे ?
3- सुप्रीम कोर्ट के जज पर महाभियोग की अनुमति क्यो नही दी ?
4- आपकी स्पीकर गिनती भी नही गिन पा रही 50 तक ? 
5- 18 दिनों तक स्पीकर की भूमिका संदेहास्पद है।
6- जस्टिस लोया का मामला दबाने को दक्षिण की पार्टी के साथ षड्यंत्र कर कार्यवाही स्थगित कर रहे रोज?
7- जब 2019 सामने दिख रहा और अपने राज्यों में रमण, शिवराज, योगी, वसुंधरा की पतली हालत दिख रही तो उपवास का नाटक कर पल्ला झाड़ रहे हो ? 
8- चार साल में हमारे रुपयों से दुनिया घूम ली, यारों को बुलाकर झूले झुलायें तब जनता और उपवास याद नही आया ?
9- कांग्रेस ने 60 साल कुछ नही किया यही बैनर पकड़कर बैठे थे ना , आपने 4 साल क्या झंडे गाड़े बताओ ? 
10- 370, कश्मीरी पंडित, पाक , राम मंदिर, 15 लाख, काला धन, समान आचार संहिता आदि पर पहल भी की ?
11- बैंकों को खाली कर दिया और नोटबन्दी कर देश को चूल्हे में झोंक दिया ? 
12- शिक्षा, स्वास्थ्य से लेकर तमाम सरकारी योजनाओं का कबाड़ा करके देश को गर्त में ला दिया? 
13- गाय, बीफ, जाति, दलित- सवर्ण, धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर समाज मे ध्रुवीकरण कर दिया।
14- न्याय जैसी प्राकृतिक व्यवस्था को दो कौड़ी का बना दिया कि सुप्रीम कोर्ट के जज रोज तुम्हारी प्रशस्ति गा रहे है।
15- मप्र से लेकर लगभग सभी तुम्हारे राज्यों में व्यापमं से लेकर बलात्कार में तुम्हारे ही संस्कारित लोग शामिल है। किसानों की आत्महत्या की संख्या ही देख लो तो अपने किये धरे का समझ आ जायेगा।

लोकसभा का सत्र विपक्ष ने नही चलने दिया यह तुम्हारा ध्येय वाक्य ही चार साल का सबसे बड़ा झूठ है जबकि तुम इस समय दोनो सदनों में बहुमत में हो - यह मालूम है ना ?
राहुल गांधी को पप्पू बोलकर तुमने नकारा है और उसके उपवास का मजाक उड़ाया जो सही भी मान लेते है पर आपका उपवास कितना बड़ा ढोंग, पलायन और मक्कारी का प्रतीक है एक बार अपने आप से तो पूछ लो।
और तिस पर नाटक पर ना शर्म आती है ना कोई पछतावा होता है।
[ समझ बूझ वाले और जिसके पास इन प्रश्नों के जवाब हो वे ही यहाँ आये, ज्ञानान्ध मित्र यहां रायता ना फैलाएँ ]

उप्र में विधायक रेप कांड पर मित्र लोग प्रतिक्रिया पूछ रहे है ।
पार्टी विथ डिफरेन्स में इस्तीफों का रिवाज नही है यह इनके संविधान और संस्कारों में है ।
केंद्र में कैबिनेट मंत्री निहाल चन्द्र याद नही जो दो साल तक मंत्री बना रहा और राजस्थान में पुलिस उसे गुमशुदा बताती रही !
फिर ये तो योगी का विधायक है जिसने गोरखपुर में ही दस हजार से ज्यादा बच्चे मर जाने पर इस्तीफा नही दिया तो क्या नैतिकता की उम्मीद करें ?
विधायक के भाई को गिरफ्तार कर झुनझुना दे ही दिया है जनता को।
जब शीर्ष नेतृत्व और पार्टी प्रमुख दो साल एक महिला का पीछा करके उसकी सीडी बनवाते है तो बाकी क्यों किसी से पूछे ?
स्त्री के साथ बलात्कार अब विधायिका के नए कर्तव्यों में शामिल है
संविधानिक पदों पर आसीन राष्ट्रपति, राज्यपाल, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट से अपेक्षा ना करें
ये सब लोग स्त्रियों का पीछा करके सीडी बनवाने में व्यस्त है , उन्हें उपेक्षित कर पुरुषवादी व्यवस्था को पुष्ट करने में मुस्तैद है और घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण कानून 2005 और जस्टिस वर्मा कृत संशोधन की धज्जियां उड़ाने के पुनीत कार्यों में संजीदगी से संलग्न है
मीडिया को एक बलात्कार और महिला हिंसा का पुल आउट रोज देना चाहिए कसम से पढ़ने में मजा आएगा और चैनल्स को इस तरह की रोचक घटनाएं लाइव दिखाना चाहिए टी आर पी बढ़ने की ग्यारंटी
बेटी बचाओ और बलात्कार लायक बनाओ सरकारों का नया नारा है
महिला आयोग, मानव अधिकार आयोग में नपुंसकों की भर्ती चालू है
प्रशासन से उम्मीद ना करें हम मसूरी में उन्हें रीढ़हीन कर देते है
पुलिस, सी बी आई हमारे लिए है ना कि जनता के लिये
मप्र और उप्र में विधायक ही राज्य प्रमुखों से ज्यादा सशक्त है
आइये नये विकासोन्मुख भारत मे हम सबके मंगल की कामना करें और राजा की प्रशस्ति में खड़े होकर राष्ट्रगान गाये
भारत माता की जय
[किसी भी वाक्य में पूर्ण विराम नही है क्योंकि इनका अंत नही है, आपमें हिम्मत हो तो कृपया उचित वाक्य और स्थान पर पूर्ण विराम लगाकर देश प्रेम प्रदर्शित करें - सादर]
कल एक आलेख लिखा था कविता की राजनीति पर।
गजब मिर्ची लगी है कुछ स्थापित, अघोरी और साहित्य - कविता, कहानी, नाटक के धंधेबाज लोगों को ।
जब मठाधीशों को सच बोलकर नंगा किया जाता है तो बिलबिला उठते है।
आज भी देखा तो दस्त लगे हुए है 
थोड़ा अलग है , बुरा लगे तो दो रोटी ज़्यादा खा लेना 
[ अभिव्यक्ति के खतरे उठाते हुए आपके मठ और गढ़ तोड़ रहा हूँ ]
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आज देवास में प्रलेस का एक कार्यक्रम है और एक इंदौर में युवा कवियों के साथ आयोजित कार्यक्रम में आई आई टी इंदौर के शोधार्थी भाई अवधेश ने अतिथि के रूप में बुला लिया। दुविधा थी तो बहुत सोचा और जो कुंठित निष्कर्ष निकले वो यहां साझा कर रहा हूँ। 
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संवादहीनता की स्थायी बीमारी हमारी नियति भी है और हम अक्सर अनजाने और जानते हुए भी बहुत कुछ छुपकर छुपाकर करते है और इसमें मैं भी शामिल हूँ और एनजीओ के धंधे में रहा हूँ तो मेरे तो मज़्ज़ा और खून में ये रोग है। पर बात करीबी और मित्रों की हो तो मैं यह दुर्लक्ष कर देता हूँ और बिल्कुल खुले रूप से और सब कुछ उघाड़ते हुए सब काम करता हूँ। पर इधर हिंदी में या लेखन में या कंसल्टेंसी के धंधे में काम कर रहा हूँ तो देख रहा हूँ कि यह छुपाकर करने का स्वरूप प्रचंड रूप में स्थापित है। 
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बहरहाल , मेरे सामने दो विकल्प है देवास का कार्यक्रम या इंदौर का। मैंने इंदौर का चुना है क्योंकि अब मुक्तिबोध से लेकर बाकी इतिहास बन चुके कवियों और उन पर हो रही बहसों और चर्चाओं से ऊब गया हूँ। इनको सुनना और उस पर समय व्यर्थ करना मूर्खता से ज्यादा कुछ नही है। विश्व विद्यालयों में हिंदी के जड़ और नख दन्त विहीन लोगों ने शोध के नाम पर इतना कचरा इकठ्ठा करके रख दिया है कि अंतरिक्ष मे भी फेंके तो जगह कम पड़ जाएगी । 
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नईम हो , देवताले, अनामिका, कात्यायनी, दुष्यंत, पाश, गोरख पांडे, राजेश जोशी, अनंत मूर्ति, आग्नेय केदार या अखिलेश, मन्नू भंडारी, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर या नामवर सिंह या कोई और तुर्रे खां इन पर क्या लिखना और क्या पढ़ना। जब ये थे या है तो इनसे भी बात करने का मन नही रहता क्योकि चुके हुए लोग कुछ करते नही और अपने एक जमाने के लिखे पढ़े को भुनाते रहते है - यहां वहां जाकर और आयोजको पर दो दिन का बोझ बन कर रह जाते है। इनके अवदान को नकार नही रहा पर हिंदी के लोग कब तक मुक्तिबोध या कुंवर नारायण, केदार या तुलसी को ढोते रहेंगे और उबाऊ बकवास करते रहेंगे - जिसका ना अंत है ना ठौर ! 
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बताइए कि हिंदी में किसी ने मुक्तिबोध के बाद इतनी दिलेरी से लिखा , सब अपनी नौकरी बचाते हुए बीबी बच्चों की देखभाल करते और सामाजिक प्रतिष्ठा बनाये हुए रह रहे है और बात संवेदना और ज्ञान की करेंगे। देश भर के हिंदी विभागों में एक ठस किस्म की मानसिकता तारी है और ये प्राध्यापक ही नही , इनके बेरोजगार निठल्ले दोस्त यार जो किसी अनियमित पत्रिका के सम्पादक हो या किसी संगठन के पद पर बरसो से बैठे कामरेड या भड़भूँजे टाईप लोग - ये सब मिलकर विवि में पढ़ने आये युवाओं को बरगलाकर बेवकूफ बनाते रहते है और सेमिनार के नाम पर एक दूसरे को उपकृत करते रहते है। इसलिए अब ना मोह है मुक्तिबोध सुनने का, ना किसी तथाकथित बड़े कवि के कविता पाठ का, ना उसकी कविताएं पढ़ने का - जो लोग यहां वहां चैंपते रहते है। मेरा पक्का मानना है कि जो लोग भी ये "नित्य कर्म निपटाने" की स्टाइल में कर रहे है - वे बचना चाहते है हर तरह से क्योकि मरे हुए और चुके हुए लठैतों पर बोलना लिखना पढ़ना आसान है और कोने पकड़ने जैसा भी है। इसलिए आज यह ब्रह्म ज्ञान हुआ कि अब से इन्हें पढ़ना लिखना बन्द । 
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इंदौर क्यों, मैंने अपने आप से पूछा तो याद आया कि नए लोग अच्छा लिख पढ़ रहे है, ओपन माईक जैसे आयोजनों से कविता , कहानी , व्यंग्य को आम लोगों तक ले जा रहे है और यदि वे कच्चे भी है तो सीखने और परिपक्व होने को तैयार है। अच्छे माहौल में आयोजन हो रहे है। एक समझ, तैयारी, मेहनत और प्रतिबद्धता से ये युवा लिख पढ़ रहे है जिसे सराहा जाना चाहिए। पिछले 20 वर्षों से हिंदी की परंपरा में बहुत लोगों को सुना पढ़ा - विद्वान और जाहिल गंवार और इन दिनों वाट्सएप नाम के बाजे में भी जहाँ शील - अश्लील चर्चाओं में रचे बसे और बेख़ौफ़ होकर अपनी दुनिया मे भयानक आत्म मुग्ध कवियों को भी देख रहा हूँ। जब देश जल रहा है ये मूर्ख लोग या तो रुद्राक्ष बेच रहे है या लड़कियों की जुल्फों या अस्सी के बाद के पाथेय और कविता पर बकर कर स्वयम्भू महान बनने के नुस्खे जुगाड़ रहे है। सौ पचास लोगों में से 20- 25 % समूह में सक्रिय लोगों की चुहलबाजी को चर्चा कहना कितना अश्लील है - पर है तो है साहब, महान और ऐतिहासिक। 
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खैर, मैं ना अब इस चक्कर मे पड़ने वाला और ना किसी महान कवि, कहानीकार, उपन्यासकार, आलोचक के पुराने पड़ चुके अप्रांसगिक बकवास को मौजूं मानने वाला, आप भी मेहरबानी करके मुझे ना बताएं। पढा लिखा हूँ और पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स से भी वाकिफ हूँ। समय बर्बाद करने के बजाय दो तीन घँटे सो लूंगा तो काया को आराम मिलेगा आपके उस तीन चार घंटे में जो सिरदर्द होगा उसका क्या - जेब ढीली वो अलग। 
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कबीर कहते थे सुनो भाई साधौ, मैं कहता हूँ पढो भाई साधौ, लिखो भाई साधौ और करो भाई साधौ - तभी हिंदी का या साहित्य का कल्याण होगा। 
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हिंदी को मास्टरों की फ्रेमवर्क से बाहर किये बिना और रोजी रोटी के लिए पूरी ढिटाई और बेशर्मी से हिंदी को ओढ़ बिछाकर आतंक फैलाते इन लोगों से हिंदी को बचाना बहुत जरूरी है वरना ये नए अभेद्य किले बन जाएंगे और आतंक फैलाएंगे।

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