Not the right way to suppress voices. This is highly unethical and undemocratic.
Why are they so afraid? Ultimately, all office bearers function on public funds and are accountable to the people. They cannot stop or withhold such accounts merely to silence criticism.
The government seems to be turning increasingly intolerant of dissent. If this trend continues, the Modi government may not even see the dawn of 2029
"इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही लहरों से टकराती तो है"
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कॉकरोच जनता पार्टी के फॉलोअर इंस्टाग्राम पर भारतीय जनता पार्टी से ज्यादा हो गए, उसके संस्थापक ने आज सुबह सभी से अनुरोध किया है कि भारतीय जनता पार्टी को अनफॉलो करना शुरू कर दें
मुझे लगता है कि यह एक तरह का शुभ संकेत है - भले ही युवा लोग जोश में आकर पार्टी ज्वाइन कर रहे हैं और हो सकता है कि वह थोड़े दिनों में कुछ धमाल भी करें, करना भी चाहिए - जब देश में 70 - 80 साल से ज्यादा के लोग अपनी राजनीतिक और निजी महत्वाकांक्षाओं, हवस और दिखावे के लिए जनता के रूपयों पर धमाल और कमाल दोनों कर रहे हैं, नीचता के स्तर को पार करके बेहद घटिया हरकतें कर रहे हैं ऐसे में यह युवा शक्ति यदि रोजगार, भ्रष्टाचार और उनकी उपेक्षा के साथ उन्हें गाली देने वाले को सामने रखकर संगठित हो रही है - तो यह प्रशंसनीय है
सुप्रीम कोर्ट के माननीय सीजेआई साहब को इस बात की बधाई दी जानी चाहिए कि उन्होंने अपना हिडन एजेंडा इस बहाने सामने कर दिया और पूरी युवा शक्ति को संगठित कर दिया, हमें निश्चित रूप से इस पार्टी को ज्वाइन भी करना चाहिए और दूसरे लोगों को प्रेरित भी करना चाहिए कि वे आगे आए और लाभ उठाएं - "कॉकरोच का साथ और सबका विकास"
बहुत जरूरी और आवश्यक पहल है, कांग्रेस ने देश का कबाड़ा किया और भाजपा ने कांग्रेस को गाली देने के अलावा कुछ नहीं किया कुल मिलाकर 12 वर्षों में और इसके पहले के कार्यकालों में भाजपा की सरकारों ने सिवाय कॉर्पोरेट लाबी को मजबूत करने के कुछ नहीं किया तभी टाटा, गोदरेज मित्तल, खेतान, अडानी, अंबानी जैसे दीमक और पूरे सिस्टम में यानी कि गटर में डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, न्यायाधीश, मीडिया, फिल्म इंडस्ट्री के भांड, ब्यूरोक्रेट्स और गुंडे - मवाली पैदा हो गए - जिन्होंने आम आदमी को सांस लेना मुश्किल कर दिया है
स्वागत किया जाना चाहिए इस नई पार्टी का, भले ही अनुभव न हो - पर काम करने की इच्छा और जोश पर्याप्त है, ऐसे ही बेवकूफ और दिग्भ्रमित करके बनाकर संघ और भाजपा ने देश पर कब्जा कर लिया, केजरीवाल, अण्णा हजारे , मनीष सिसोदिया, प्रशांत किशोर या ऐसे अनेक नगीने गली - मुहल्ले में मिल जायेंगे कमबख्त, तो इन्हें भी एक अवसर दें , देखें क्या नया होता है, स्व दुष्यंत कुमार कहते थे -
"हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए,
तेरे सीने में नहीं तो मेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए"
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पूरी रिपब्लिकन पार्टी और वर्तमान का मंत्रिमंडल यही डिजर्व करता है, कमजोर और अनपढ़ ट्रंप हेले को जवाब नहीं दे पाया और पूरा आईटी सेल मेलोनी को मेलोडी खिलाकर ध्यान भटकाने में लग गया, कोई शर्म है रिपब्लिकन पार्टी को, यहां जनता त्रस्त है और वो घूम रहा और चॉकलेट्स खा रहा
राहुल ने जो बोला एकदम सही बोला, इतनी खुद्दारी है और जमीर बाकी है तो अब अगले साल भर या कम से कम छह माह कही मुंह मारने मत जाना और महंगाई पर काम कर बै ट्रंप, दिनों दिन जवाबदारी और बोझ बनता जा रहा है, तेरे कपड़े और तेरी हंसी से अब उबकाई आने लगी है और तेरे मीडिया के पिल्ले और कुतियाएं आज जिस अंदाज में बिलबिला रहे थे खासकरके अंजना आंटी उसे देखकर तो 45 डिग्री में भी दिन ठंडक भरा गुजरा
आज हंगरी के नेता को देखा कि नहीं कैसे जनता ने सोलह साल बाद सत्ता से हकाल दिया, सोच ले तेरा क्या होगा
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बहुत दिनों में स्व. दुष्यंत कुमार की यह गजल पढ़ी तो नए संदर्भ और ताज़ा प्रसंगों में यह नए अर्थ खोलते चली गई
"तू इस मशीन का पुर्ज़ा है, तू मशीन नहीं", यह पंक्ति तो कमाल की है, हम लोगों को जमाने भर के अधूरे कामों और दुनिया भर का तनाव रहता है, पर यह पंक्ति पढ़कर बहुत कुछ साफ हुआ - बहरहाल, आप भी समझिए इसे फिर से पढ़कर
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तुम्हारे पाँवों के नीचे कोई ज़मीन नहीं,
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं
मैं बेपनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ,
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं
तेरी ज़ुबान है झूठी जम्हूरियत की तरह,
तू एक ज़लील-सी गाली से बेहतरीन नहीं
तुम्हीं से प्यार जताएँ तुम्हीं को खा जाएँ,
अदीब यों तो सियासी हैं कमीन नहीं
तुझे क़सम है ख़ुदी को बहुत हलाक न कर,
तू इस मशीन का पुर्ज़ा है, तू मशीन नहीं
बहुत मशहूर है आएँ ज़रूर आप यहाँ,
ये मुल्क देखने के लायक़ तो है, हसीन नहीं
ज़रा-सा तौर-तरीक़ों में हेर-फेर करो,
तुम्हारे हाथ में कॉलर हो, आस्तीन नहीं
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यह जगदीश उपासने माखनलाल राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल का कुलपति रह चुका है, भोपाल में रिटायर्ड और बोझ बने ब्यूरोक्रेट्स हो या इस तरह के घटिया लोग - भाजपा और मोती के तलवे चाटने में उस्ताद है और इन्हें सिर्फ मलाई खानी है बजाय वैचारिक प्रतिबद्धता निभाने के, एक दिलीप मंडल है ही - जो आजकल मशरूम से लेकर मछली और मफिन्स खाता है
वैसे इस मास्टर को क्या दिक्कत है , कोई भी महिला कुछ भी पहने या ओढ़े, इसको यह अधिकार किसने दिया और हम सब जानते है कि चरित्र हनन करना सबसे आखिरी और नीचतम उपाय है जब आपके पास तर्क खत्म हो जाए, आश्चर्य है कि एक अकादमिक व्यक्ति इतना पतनशील हो चुका है कि उसका पूरा शोध और दृष्टि यही तक सीमित है - हद है कुंठित मानसिकता की , यही होता है मतलब विवि में, यही शिक्षा - दीक्षा दे रहे बच्चों और युवाओं को, गोबर खाकर गौशाला में पलने वाले और पालने वालों को देख लो एक बार , तभी ना भारतीय मीडिया विश्वसनीयता खो चुका है और दलाल बन गया है
शर्मनाक है कि कुलपति के पद तक रह चुका व्यक्ति इतना घटिया और मणिशंकर है, इसे तो यह चित्र देखकर मजा आया होगा और शायद अपने बेडरूम में लगाकर रखा होगा
संघी कुंठित मानसिकता के शिकार है और खासकरके बड़े पदों पर बने हुए या रह चुके ये लोग कभी नहीं सुधरेंगे
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Unfortunately, many of our IFS officers seem to lack even basic professionalism. Forget Modi — he never faces the press — but these officers too appear insensitive and clueless, especially in the way they communicate and behave with women. Shameful. Such bureaucrats become a burden on the public system rather than serving it.
Sadly, much of the Indian bureaucracy today appears lethargic, cowardly, and disconnected from reality. They seem more occupied with preserving their comfort and privilege than being accountable to citizens.
What is even more surprising is that some bureaucrats are now trying to justify Modi’s avoidance of press conferences, offering amusing explanations about rankings and protocols to defend what is essentially political cowardice.
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हेले स्वेंडसेन, हम शर्मिंदा है कि हमारे विश्व स्तर के नेता और तथाकथित छप्पन इंची छाती के प्रधान तुम्हारे सवाल का जवाब नहीं दे सकें
हम दुनिया भर की समस्त पत्रकार बिरादरी से भी माफी चाहते है कि एक अंग्रेजी ना जानने वाला या जवाब न देने वाला व्यक्ति सवालों को व्योम में छोड़कर भाग गया, हमारे देश में दलाल मीडिया के बीच रहकर वह भूल गया कि जिम्मेदारी और जवाबदेही कुछ होती है, हमारे देश के जाहिल, गंवार और चाटुकार मीडिया ने उसे और उसके निर्मम, मणिशंकर, नालायक, भ्रष्ट और इस्तीफा ना देने वाले मंत्रियों को मालिक समझकर अपना कर्तव्य निभाना तो दूर जमीर भी बेच दिया है, हम एक सौ पचास करोड़ लोग अपनी बेइज्जती पर गर्व करते है आज
हेले, हम शर्मिंदा है कि हमारे यहां अंजना ओम से लेकर चित्रा और तमाम रजत, अभिसार, दीपक, सुधीर, और ढेर अकुशल, दारू के एक पाव पर बिक जाने वाले कायरों की फौज है और तुम इन जैसों की कल्पना भी नहीं कर सकती
पर इस सबके बाद भी हमें गर्व है कि घुमंतू जनजाति का एक व्यक्ति देश में महंगाई बढ़ाकर , बाईस लाख विद्यार्थियों को रोता - बिलखता छोड़कर विदेशों में सुख की तलाश में यायावर बना घूम रहा है
ओम शांति तुम्हारे लिए हेले
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"संसार में एक स्त्री ही एहसानों का बदला चुकाने का तरीका बेहतर तरीके से जानती है और वह भी उन परिस्थितियों में जब एहसान करने वाला जीवन के नैराश्य में भटकते हुए बहुत मुसीबत में आ गया हो, और उसे अंधेरे में कुछ सूझ नहीं रहा हो तब स्त्री आगे आकर हाथ पकड़ती है और उजालों की ओर ले जाती है..."
कल उससे बात कर रहा था तो वह बहुत उत्साह से बता रहा था कि - "अभी जब मुसीबतों से घिरा हूँ तो उसने आकर दिलासा ही नहीं दी, बल्कि आसरा दिया, काम दिया और अब कुछ दिन भूख से लड़ सकूंगा, कुछ दिन में फिर से खड़ा हो जाऊंगा" - यह कहते हुए वह अपने फटे कोट को सिल रहा था हाथ में एक मोटे सुए को लेकर, पांव की बिवाईयाँ टूटी स्लीपर से छुप भी रही थी, बाल उलझ गए थे, दाढ़ी खिचड़ी हो गई थी, यदि अंधेरे में कोई उसे देखता तो एक बारगी डर सकता था पर यह सब कहते हुए उसके चेहरे पर आशा का एक प्रचंड सूरज निखर रहा था, मैं लौट रहा था और सोच रहा था नदी जब बड़े और विशाल समुद्र से मिलती है तो उसके मन में क्या रहता होगा, क्या सच में स्त्रियां इतना दुस्साहस कर सकती है, अपने पति के होते हुए किसी पुरानी पासबुक में दर्ज क्रेडिट में एक खनखनाता नोट जमा करते हुए - पता नहीं पर यह सच घटित होते दिख रहा था
[लिखी जा रही कहानी का एक अंश]
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हर संत का एक अतीत होता है और हर दुष्ट का एक भविष्य होता है बस इतना अगर हम सोच और समझ लें तो जीवन धन्य हो जाएगा
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