विदुषी और प्रखर चिंतक छोटी बहन डॉ. अमिता नीरव का लम्बा चौड़ा उपन्यास "माधवी" लिए हुए करीब तीन वर्ष हो गए, कई बार पूरा पढ़ने की कोशिश की, पर कभी समय का अभाव, कभी आलस और कभी उसकी मोटाई देखकर हिम्मत नहीं हुई, अपनी बीमारियां, आंखों के दर्द और शुगर की वजह से लगातार फोकस ना कर पाना, आदि कारण रहें - पर पिछले दिनों लंबी - लंबी यात्राओं में पढ़ा और खूब तसल्ली से पढ़ा, इस बीच अमिता ने कई बार मिलने पर ताने दिए, फेसबुक पर लिखा, हमारी लड़ाई भी हुई, सुलह हुई - फिर सोचा कि गुरू पढ़ना तो चाहिए, इसलिए शुरू किया और अबकी बार कोलकाता, भुवनेश्वर, अजमेर, भोपाल, दिल्ली की यात्रा में साथ रखा और पढ़ा, नोट्स बनाता था और कल देर रात तीन बजे तक लिखता रहा और आज हिम्मत करके इसे फाइनल किया
अमिता इनमें से किसी एक यात्रा के फ्लाईट टिकिट का भुगतान कर दें तो आभारी रहूंगा
, बहरहाल आप पढ़िए टिप्पणी लंबी और बगैर किसी पूर्वाग्रह के लिखी है, अमिता, अब ये मत कहना कि मैं आलसी हूँ और भेदभाव करता हूँ लेखकों में, इस बीच अमिता की कई कहानियां और किताबें आ चुकी है, वे लिखती रहें और यश कमाती रहें, उनकी मोदी कीर्ति - जो चारो दिशाओं में फैली है, की कामना करता हूँ
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समकालीन हिंदी साहित्य में पौराणिक आख्यानों की पुनर्व्याख्या एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति के रूप में उभरी है। विशेषतः स्त्री-पात्रों को केंद्र में रखकर लिखे जा रहे उपन्यास केवल मिथकों का पुनर्पाठ नहीं करते, बल्कि वे इतिहास, सत्ता, नैतिकता और स्त्री-अस्तित्व के प्रश्नों को नए ढंग से देखने की दृष्टि भी प्रदान करते हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में लेखिका अमिता नीरव का उपन्यास “माधवी” उल्लेखनीय है।
यह उपन्यास महाभारत की एक अपेक्षाकृत उपेक्षित स्त्री-पात्र माधवी को केंद्र में रखकर लिखा गया है, किंतु इसका उद्देश्य केवल कथा-विस्तार नहीं, बल्कि उस स्त्री-पीड़ा और सामाजिक संरचना को उद्घाटित करना है जिसमें स्त्री को सदियों से ‘उपयोग की वस्तु’ मान लिया गया।
उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह मिथक को आधुनिक संवेदना से जोड़ता है। आज का हिंदी साहित्य केवल मनोरंजन या आदर्शवाद तक सीमित नहीं है; वह इतिहास और मिथक के भीतर दबे हुए स्वरों को सामने लाने की कोशिश कर रहा है। “माधवी” इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। महाभारत में माधवी का प्रसंग बहुत छोटा है, परंतु उसमें स्त्री-अस्तित्व का जो गहन त्रासद पक्ष छिपा है, उसे अमिता नीरव ने विस्तृत और संवेदनात्मक रूप में सामने रखा है।
माधवी राजा ययाति की पुत्री है, जिसे ऋषि गालव की गुरु-दक्षिणा पूरी करने के लिए बार-बार अलग-अलग राजाओं को सौंपा जाता है। वह प्रत्येक राजा को पुत्र देती है और पुनः कौमार्य प्राप्त कर लेती है। यह मिथकीय तत्व अपने आप में प्रतीकात्मक है। उपन्यास इसी प्रतीक को आधुनिक स्त्री-विमर्श की दृष्टि से पढ़ता है। यहाँ माधवी केवल एक पात्र नहीं, बल्कि वह समूची स्त्री-जाति का प्रतिनिधित्व करती है जिसे पुरुष-प्रधान व्यवस्था ने अपनी आवश्यकताओं के अनुसार इस्तेमाल किया।
समकालीन साहित्यिक परिदृश्य में पौराणिक कथाओं की वापसी के पीछे केवल अतीत के प्रति आकर्षण नहीं, बल्कि वर्तमान के प्रश्नों की बेचैनी है। हिंदी में पिछले कुछ वर्षों में अनेक लेखकों ने महाभारत और रामायण के पात्रों को नए ढंग से प्रस्तुत किया है। इन पुनर्पाठों में स्त्री-पात्रों की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही है। द्रौपदी, गांधारी, कुंती, उर्मिला और सीता की तरह माधवी भी अब केवल एक ‘पौराणिक पात्र’ नहीं रह जाती, बल्कि वह सामाजिक विमर्श का केंद्र बनती है। अमिता नीरव का यह उपन्यास इसीलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मिथक को आधुनिक स्त्री-अनुभव के साथ जोड़ता है।
उपन्यास की सबसे बड़ी शक्ति उसका चरित्र-निर्माण है। माधवी के भीतर चलने वाला द्वंद्व, उसका मौन, उसकी विवशता और धीरे-धीरे विकसित होता आत्मबोध अत्यंत प्रभावशाली ढंग से उभरता है। वह केवल दुख सहने वाली स्त्री नहीं है; वह प्रश्न भी करती है। वह यह समझने लगती है कि उसका जीवन दूसरों के स्वार्थ की पूर्ति का माध्यम बना दिया गया है। यही बिंदु उपन्यास को आधुनिक बनाता है।
माधवी का चरित्र कई स्तरों पर व्याख्यायित होता है। एक ओर वह त्याग और समर्पण की प्रतिमूर्ति दिखाई देती है, वहीं दूसरी ओर वह उस व्यवस्था के विरुद्ध मौन प्रतिरोध भी बन जाती है जिसने उसकी इच्छाओं का कोई मूल्य नहीं समझा। उपन्यासकार ने माधवी को करुणा का पात्र बनाकर छोड़ नहीं दिया, बल्कि उसके भीतर की चेतना को भी स्वर दिया है। यही कारण है कि पाठक उसके साथ केवल सहानुभूति नहीं रखता, बल्कि उसके माध्यम से पूरे सामाजिक ढाँचे पर प्रश्न उठाने लगता है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि उपन्यास पुरुष पात्रों को पूर्णतः खलनायक बनाकर प्रस्तुत नहीं करता। गालव, ययाति अथवा अन्य राजा अपने समय और व्यवस्था के प्रतिनिधि हैं। वे धर्म, वचन और कर्तव्य के नाम पर जो कुछ करते हैं, वह उस सामाजिक संरचना का हिस्सा है जिसमें स्त्री की स्वतंत्र सत्ता स्वीकार नहीं की जाती। इस दृष्टि से उपन्यास केवल व्यक्तियों की आलोचना नहीं करता, बल्कि पूरी सभ्यता के नैतिक ढाँचे पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
समकालीन हिंदी साहित्य में लंबे उपन्यासों की भूमिका पर विचार करें तो स्पष्ट होता है कि आज त्वरित उपभोग की संस्कृति के बीच लंबा उपन्यास एक गंभीर साहित्यिक हस्तक्षेप की तरह उपस्थित है। “माधवी” का कथानक और उसका विस्तार इस बात की माँग करता है कि उसे विस्तारपूर्वक लिखा जाए। लंबे उपन्यास का लाभ यह है कि वह पात्रों की मनःस्थितियों, सामाजिक संदर्भों और वैचारिक संघर्षों को विस्तार से विकसित कर सकता है। अमिता नीरव ने इस संभावना का उपयोग किया है। वे केवल घटनाओं का क्रम नहीं देतीं, बल्कि उनके पीछे की मानसिक और सांस्कृतिक संरचना को भी उभारती हैं।
हालाँकि कहीं-कहीं उपन्यास का विस्तार बोझिल भी प्रतीत होता है।
कुछ प्रसंगों में वर्णनात्मकता अधिक हो जाती है, जिससे कथा की गति धीमी पड़ती है। फिर भी यह विस्तार उपन्यास को वैचारिक गहराई देता है। आज जब साहित्य में संक्षिप्तता और तात्कालिकता का दबाव बढ़ रहा है, ऐसे में “माधवी” जैसा उपन्यास पाठक से धैर्य और संवेदनात्मक सहभागिता की माँग करता है। यही इसकी साहित्यिक महत्ता भी है।
भाषा की दृष्टि से उपन्यास अत्यंत संवेदनशील और प्रभावपूर्ण है। अमिता नीरव की भाषा में काव्यात्मकता है, परंतु वह कृत्रिम नहीं लगती। संस्कृतनिष्ठ शब्दावली और लोक-संवेदना का संतुलित प्रयोग उपन्यास को एक विशिष्ट वातावरण प्रदान करता है। संवाद संयमित हैं और कई स्थानों पर अत्यंत मार्मिक बन पड़े हैं। लेखिका वर्णन के माध्यम से दृश्य रचने में सक्षम हैं; प्रकृति, राजमहल और आश्रम के वातावरण का चित्रण पाठक को कथा के भीतर ले जाता है।
उपन्यास की शैली विश्लेषणात्मक और भावात्मक दोनों है। इसमें केवल घटनाओं का पुनर्कथन नहीं है, बल्कि घटनाओं के भीतर छिपे अर्थों की खोज भी है। कई स्थानों पर लेखिका की वैचारिक टिप्पणी सीधे दिखाई देती है, जो कभी-कभी कथा पर भारी पड़ती है, किंतु अधिकांशतः यही टिप्पणी उपन्यास को समकालीन विमर्श से जोड़ती है।
इस उपन्यास का सबसे बड़ा योगदान यह है कि यह मिथकीय स्त्री को ‘देवी’ या ‘त्यागमूर्ति’ के पार जाकर मनुष्य के रूप में देखने की दृष्टि देता है। माधवी की पीड़ा केवल व्यक्तिगत नहीं है; वह सामाजिक और ऐतिहासिक है। वह प्रश्न करती है कि धर्म और मर्यादा की पूरी व्यवस्था में स्त्री की इच्छा कहाँ है। यह प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना महाभारत के समय में रहा होगा।
फिर भी, उपन्यास में कुछ ऐसी संभावनाएँ थीं जिन्हें और अधिक विकसित किया जा सकता था। उदाहरण के लिए, माधवी के आंतरिक मनोविज्ञान को और अधिक गहराई से उकेरा जा सकता था। कई बार वह प्रतीक अधिक बन जाती है और मनुष्य कम। यदि उसके व्यक्तिगत सपनों, इच्छाओं और निजी संवेदनाओं को और विस्तार मिलता, तो उसका चरित्र और अधिक जीवंत हो सकता था। इसी प्रकार, जिन राजाओं और पुरुष पात्रों के माध्यम से वह गुजरती है, उनके साथ उसके संबंधों की जटिलता को भी अधिक सूक्ष्मता से विकसित किया जा सकता था।
उपन्यास में सामाजिक संरचना की आलोचना तो प्रभावशाली है, किंतु कहीं-कहीं आधुनिक स्त्री-विमर्श की भाषा पात्रों के समय-संदर्भ से बाहर जाती हुई प्रतीत होती है। हालांकि यह पौराणिक पुनर्पाठ की सामान्य चुनौती भी है कि वह अतीत और वर्तमान के बीच संतुलन कैसे बनाए।
उपसंहारतः कहा जा सकता है कि “माधवी” समकालीन हिंदी साहित्य का एक महत्वपूर्ण पौराणिक पुनर्पाठ है। यह उपन्यास मिथक को वर्तमान की दृष्टि से देखने का साहस करता है और स्त्री-अस्मिता के प्रश्न को गंभीरता से उठाता है। इसकी भाषा, शैली और वैचारिक दृष्टि इसे विशिष्ट बनाती है। कुछ सीमाओं के बावजूद यह उपन्यास पाठक को गहरे स्तर पर उद्वेलित करता है और यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि सभ्यता, धर्म और नैतिकता के जिन आदर्शों पर हम गर्व करते हैं, उनके भीतर स्त्री की कितनी पीड़ा और मौन छिपा हुआ है। यही किसी बड़े साहित्य की पहचान भी है कि वह केवल कहानी न सुनाए, बल्कि हमारी चेतना को विचलित करे और हमें नए प्रश्नों के सामने खड़ा कर दे।
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