Friday, September 11, 2015

Posts of 10-11 Sept 15


वन अधिकारी क्या कर सकते है इसकी मिसाल देखनी हो तो किसी भी आदिवासी इलाके में चले जाईये और फिर देखिये इनका उत्पात. झाबुआ के रानापुर ब्लाक के ग्राम नलदी छोटी और टेमरिया में आदिवासियों की खडी फसल पर जेसीबी मशीन चला दी, महिलाओं को मारा और बेइज्जत किया. जानते है क्यों, क्योकि ये आदिवासी वन अधिकार पट्टे मांग रहे थे जिन्हें सन 2014 में मान्य किया जा चुका है वन क़ानून के तहत. आठ सितम्बर को हुई जन सुनवाई में भी इन आदिवासियों ने यह मांग उठाई थी परन्तु कोई जवाब नहीं दिया. अभी इस कार्यवाही के बाद एक स्थानीय संस्था के हस्तक्षेप से पुलिस में एफ आई आर की गयी है परन्तु कोई कार्यवाही अभी वन विभाग के खिलाफ नहीं हुई है. 

कब तक आदिवासी यह सहते रहेंगे, इन्हें शर्म नहीं आई कि जिस समय फसलें बड़ी मुश्किल से पक रही है और पानी की कमी है, भूख और गरीबी की त्राहि त्राहि हर जगह मची हुई है, गरीबी भुखमरी और कुपोषण के शिकार महिलायें और बच्चे हो रहे है,  वहाँ खडी फसलों को इस तरह से जेसीबी मशीन द्वारा नष्ट करना किस अमानुषिक और बर्बर समाज, शिक्षा और विकास का प्रतीक है?

प्रदेश में नेताओं और सत्ताधारी पार्टी को धन उगाहने और झान्कीबाजी चापलूसी से फुर्सत मिलें और विपक्ष जैसे बसपा या कांग्रेस को घटियापन से फुर्सत मिले तो इन आदिवासियों की बात सुने कोई? 

बालाघाट, पन्ना, सिवनी, मंडला,  डिंडोरी, खंडवा, शिवपुरी, आलीराजपुर, झाबुआ यानी लगभग हर आदिवासी इलाके में वन विभाग की गुंडागर्दी से लोग तंग आ गए है और हद यह है कि जिला प्रशासन या कलेक्टर वन विभाग का मामला बताकर चुप हो जाता है.

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बहुत मजेदार है ........जैन समुदाय के कहने पर शिवराज सिंह मप्र के कुपोषित बच्चों को अंडा नहीं दे रहे, जैन समाज के पर्युषण पर्व पर मांस पर देश के हर राज्य में प्रतिबन्ध लगाने में होड़ लगी है. भाजपा के शासन में जैन समुदाय एकाएक इनता ताकतवर हो गया यानी सीधा गणित है भिया कि जैन समुदाय संघ को बड़ी मात्रा में हर साल दो नम्बर का रुपया दान में देता है और अब अपनी मर्जी से देश के बड़े फैसले करवाएगा.....आ जाए अल्प संख्यक से बाहर और सामान्य बनकर देश में सामाजिक काम करें......और बाकी लोगों से निवेदन कि
आप लोग भी "देश के सच्चे नागरिक बनिए" 
tongue emoticon
ये दीगर बात है कि मांस के सबसे बड़े निर्यातक जैन समुदाय के ही अहिंसक, अपरिग्रही और निर्व्यसनी लोग है.


 



खत्म हो रही है ये फसलेँ और शायद कभी मोटा अनाज दूरदराज के आदिवासी गाँवों में भी देखने को भी ना मिले। झाबुआ में पानी के अभाव में नष्ट हो रही ज्वार मक्का।




आदिवासी बचपन और झाबुआ जिले के बच्चे जो स्कूलों में नही इन दिनों अपने खेतो में ककड़ी भुट्टों की रक्षा कर रहे है।


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