Thursday, September 24, 2015

आदिवासियों को मुख्यधारा में लाये बिना कुपोषण से मुक्ति असंभव है - संदीप नाईक





पिछले दिनों मप्र के शिवपुरी में कुपोषण का मामला बहुत गर्माया और इस तरह से मप्र में कुपोषण की जमीनी हकीकत सामने आई. लगता है मप्र में कुपोषण एक स्थाई समस्या बन गया है लगता है और तमाम तरह के प्रयासों के बावजूद इस मुद्दे से निजात पाने में सरकारी प्रयास असफल लग रहे है बावजूद इसके कि महिला बाल विकास से लेकर स्वास्थ्य विभाग के अमले ने इसे ख़त्म करने की ठान रखी है. दरअसल में आदिवासियों के बीच यह समस्या बहुत ज्यादा है, जैसाकि हम सब जानते है कि मप्र में आदिवासियों की संख्या सबसे ज्यादा है और प्रदेश के कई  जिले आदिवासी बहुल जिले है और शिशु मृत्यु दर की मात्रा इन्ही जिलों में है. थोड़ा सा गंभीरता से देखें तो हम पाते है कि इन जिलों में आंगनवाडी सेवाओं का संजाल तो बहुत दूर डोर तलक फैला हुआ है, स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी भी पदस्थ है परन्तु सेवाओं का जो सतरत होना चाहिए वह पर्याप्त रूप से नहीं होने के कारण कुपोषण से योजनाबद्ध तरीके से नहीं लड़ा जा रहा फलस्वरूप बीच बीच में ऐसे केस आने से सारे प्रयासों पर पानी फिर जाता है. एक तो आंगनवाडी कार्यकर्ताओं की दक्षता का सवाल है क्योकि आदिवासी इलाकों में शिक्षित कार्यकर्ता मिलना बहुत मुश्किल है, मसलन शिवपुरी के पोहरी ब्लाक में मडखेडा, देहदे जैसे गाँव में कार्यकर्ता अशिक्षित है. खंडवा के खालवा ब्लाक के कई गाँवों में कार्यकर्ता बहुत बुजुर्ग हो गयी है. 

प्रदेश के कई आदिवासी जिलों में कई कार्यकर्ता या तो अपंग है, मानसिक रूप से बीमार है या रिटायर्डमेंट की कगार पर है, इसलिए उनके बदले परिवार का कोई भी सदस्य आकर खाना परोस देता है और बस काम चल जाता है. कई गाँवों में कार्यकर्ता अप डाउन करती है और सहायिका के भरोसे केंद्र चलता है. जबकि बच्चों के बीच में कुपोषण की पहचान करना और उन्हें चिन्हित करके पोषण पुनर्वास केंद्र पर भेजना एक महत्वपूर्ण तकनीकी तरह का काम होता है. दूसरा आंगनवाडी केन्द्रों पर टीकाकरण की स्थिति भी ठीक नहीं है - जहां एएनएम माह में आकर बच्चों के स्वास्थ्य का परीक्षण करती है टीका लगाती है और रेफर करती है साथ ही गर्भवती माताओं को गर्भावस्था के दौरान सेवाएँ उपलब्ध करवाती है. टीके को लेकर आदिवासी समुदाय में बहुत तरह के भ्रम अभी है मसलन बुखार आने पर वे इसे दैवीय प्रकोप मानने लगते है, और वे फिर टीका नहीं लगवाते. उनके बीच सलाह यानि काउन्सलिंग की बहुत ज्यादा जरुरत है परन्तु दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो पा रहा है. 

हाल ही दिनांक 12 सितम्बर को मै सिवनी जिले के घंसौर ब्लाक के गाँव रूपदौन में गया था जहां एक शिक्षिका ने बताया कि गाँव में दो मृत्यु हो गयी है जिसकी वजह से गाँव के लोगों ने चालीस हजार इकठ्ठा करके एक तांत्रिक को बुलाया है जो कल आकर पूजा करेगा और गाँव से विपत्ति भगाएगा. मैंने गाँव के लोगों से और उन आदिवासी शिक्षिका से लम्बी बात की पर वैज्ञानिक चेतना के अभाव में आखिर गाँव के लोगों ने  दुसरे दिन सुबह कही से तांत्रिक को बुलाकर पूरा अनुष्ठान संपन्न किया और फिर वे महिला अध्यापिका हमारे प्रशिक्षण में आई.


आदिवासी जब पोषण पुनर्वास केंद्र पर अपने गंभीर कुपोषित बच्चों को लेकर आते है तो कई प्रकार की समस्याएं उन्हें होती है. सबसे पहले तो अधिकाँश परिवार एकल परिवार है जिनमे पांच से लेकर आठ बच्चे है, एक बच्चे को पुनर्वास केंद्र में भर्ती कर देने से माँ को भी पूरे चौदह दिन वहाँ उस बच्चे के साथ रहना पड़ता है जोकि उसके लिए संभव नहीं होता, क्योकि उसके दूसरे बच्चों की देखभाल कौन करेगा? केंद्र में बच्चे के साथ सिर्फ माँ ही रह सकती है बाकी बच्चों के लिए जगह नहीं है और प्रावधान भी नहीं है लिहाजा अन्य छोटे बच्चों की फ़िक्र में वह नहीं रह पाती. दूसरा माँ को रहने का खर्च मिलता है जोकि अपर्याप्त होता है. यदि वह घर में है तो मजदूरी के साथ वह परिवार के साथ साथ अपने खेत, जानवरों की भी देखभाल कर पाती है. केंद्र के शहरी माहौल में वह आसानी से अपने को समायोजित नहीं कर पाती कि चौदह दिनों तक वह बच्चे के साथ रह सकें. हालांकि गंभीर कुपोषण के मामले में पोषण पुनर्वास केंद्र से बेहतर कुछ हो नहीं सकता, बीच में महिला बाल विकास विभाग ने सेक्टर स्तर पर गाँवों में हफ्ते हफ्ते के शिविर लगाकर कुपोषण से ग्रस्त बच्चों को ठीक भी किया था. तीसरी महत्वपूर्ण समस्या है पलायन, हाल ही मैंने पन्ना, सिवनी, मंडला, डिंडोरी, झाबुआ और आलीराजपुर जिलों के दूर दराज के सघन जंगल में बसे गाँवों में यात्रा की है. पलायन एक बड़ी समस्या है क्योकि पानी के अभाव में पड़े सूखे से गाँवों में काम नहीं है, रोजगार ग्यारंटी के काम है नहीं, लोगों ने इस योजना में अपने आस्था खो दी है इसलिए इस त्राहिमान समय में जब उनके अपने खेतों की फसलें भी सूख रही है तो वे दिल्ली, मुम्बई, कानपुर, गुडगाँव, अहमदाबाद, सूरत जैसे शहरों में पलायन कर रहे है. मंडला, पन्ना में  पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों ने बताया कि पलायन एक बड़ी समस्या है, रोजगार ग्यारंटी योजना के भुगतान देरी से मिलने के कारण आदिवासी इसमे काम करना पसंद नहीं करते, वे पलायन कर जाते है और चार से छः माह बाद लौटते है, और इसका सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ता है जब वे पलायन से वापिस आते है तो बच्चे और कमजोर हो जाते है जिन्हें ठीक करना हमारे लिए बड़ी चुनौती हो जाता है. 


अब सवाल यह है कि व्यापक स्तर पर कैसे लोगों के बीच काम कर रहे एनजीओ और लोग सक्रीय होकर आदिवासियों के बीच जागृति का काम करें ताकि वे अपने बच्चों में कुपोषण जैसी गंभीर समस्या को लाकर सचेत हो सके और इससे स्थाई मुक्ति मिल सकें. जरुरत है समग्र स्तर पर प्रयास करने की. शिक्षा का प्रसार, सलाहकार सेवाएँ, जागरूकता अभियान, सेवा देने वाले कर्मचारियों में सेवा भाव और निष्ठा से काम करने का जज्बा पैदा करना और सेवाओं की पहुँच में गुणवत्ता सुनिश्चित किये बिना हम आदिवासियों को ना मुख्य धारा में ला सकते है ना उनके बच्चों को कुपोषण या अन्य बीमारियों से बचा सकते है. 

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