Sunday, July 29, 2012

एक बार फ़िर फराज.............

खुद को चुनते हुए दिन सारा गुज़र जाता है फ़राज़
फ़िर हवा शाम की चलती है तो बिखर जाते हैं

मेरे सब्र की इन्तेहा क्या पूछते हो फ़राज़
वो मेरे गले लग कर रोया किसी और के लिए 


वो मुझ से बिछड़ कर अब तक रोया नहीं फराज़
कोई तो है हमदर्द जो उसे रोने नहीं देता

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