Monday, February 22, 2016

Posts of Feb 15 to 22 , 2016 Notes, Jottings on JNU Issues.......

हमने तो सिर्फ हाथ उठाया सलाम को, 
समझा उन्होंने इसमें है ख़तरा निज़ाम को

-अदम गोंडवी


क्या यह महज संयोग है कि जे एन यु में पांच छात्र पहुंचे और जाट आन्दोलन ठंडा पड़ा ?
किसको बेवकूफ बना रहे हो सरकार ? जनता तो बहुत मैच्योर हो गयी है आप लोग भी बड़े हो जाओ, सड़े गले बौद्धिक सुनना बंद कर के दिमाग की खिड़कियाँ खोलो और थोड़ा पढो - लिखो........कब तक खुद जाहिल बने रहोगे और जनता को बनाते रहोगे....... तुम चाहते थे कि एक ही तीर से दिल्ली, जाट और जेएनयु को साध लोगे.......मुगालते में हो तुम्हारी नाक के नीचे अरविन्द ने काम करके दिखा दिया एक साल में और वो भी बगैर कांग्रेस को कोसे और शीला दीक्षित को याद किये बिना और एक तुम हो जो भ्रम फैला रहे हो कि साठ साल के पाप धोने को समय चाहिए......हांहांहांहां.........अपने आप से तो सच बोल लो महाराज...
एक विश्व दीपक ने तुम्हारे और सुधीर चौधरी जैसे दलाल की पोल खोल दी, दस लड़कों ने नानी याद दिला दी, तुम्हारे खट्टर के राज में जाटों ने देश प्रेम दिखाकर संपत्ति का सत्यानाश कर दिया......गजब....
याद रखना तुमसे ज्यादा समझ और एक्सपोजर तो तीन साल जेएनयु में पढ़े एक युवा छात्र की होती है और वो इतना पढ़ लेता है तीन सालों में कि तुम्हारा दीनानाथ बत्रा सात जन्मों तक नहीं पढ़ पायेगा..........
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कल देवास में कबीर यात्रा देखी,100 लोगों की भीड़ के साथ चल रही यात्रा में आधे से ज्यादा परिचित लोग, दोस्त और पुराने साथी थे। जिस मकसद से हम लोगों ने 1992 में कबीर मण्डलियों के साथ काम शुरू किया था और एक अभियान बनाया था वह इस संगीत, रॉक और कैफे के बीच कही खो गया है। अफ़सोस यह भी है कि इसमें कई समझदार साथी अभी भी है, अच्छे लोग, युवा अपने व्यवसाय छोड़कर आये जरूर है पर ग्लैमर और चकाचोंध की दुनिया का भरम वो बनाये हुए है और कबीर लोक परम्परा से हटकर एलिट और विशेष लोगों का खास तरह के आडम्बर और ओढी हुई "सादगी" की बानगी बन गया है।
भजन अब गाने बन गए है और सूफीयाना स्वरुप प्रस्तुति - जो एक समूची परम्परा को ठेठ, गँवईपन को नष्ट कर रहा है। हालांकि दर्शक वृन्द अभी भी वही है जो कबीर गाता है - मेहनतकश और समाज में हाशिये पर पड़ा, शहरों में जरूर एक अभिजात्य वर्ग बना होगा पर हमारे कस्बे में कल नब्बे प्रतिशत वही लोग थे - जो विस्मित थे इस रॉक और कैफे को देख सुनकर। सिर्फ ताली बजाने और रॉक बैंड पर वाहवाही लूटने से कबीर यात्रा तो हो जायेगी पर कबीर जिस "ज्यों की त्यों धर दीनी" की बात करते थे या कहते थे "मौको कहाँ ढूंढे रे बन्दे" वह खो जाएगा। 
आपको क्या लगता है, आपने तो आनुषंगिक अनुसंधान किया है कबीर को आत्मसात करके डा Linda Hess, Purushottam Agrawal जी। मुझे मालूम है कि समय बदल रहा है, रुचियाँ बदल रही है, कबीरा बाजार में खड़ा है पर फिर कबीर गाने का या समझने का अर्थ क्या - जब ये ताकतें हावी होती रहे और उसी कबीर को रॉक और कैफे में तब्दील कर दिया जाए और हम पीछे खड़े हाथ मसोजते रह जाए ? मेरे लिए ये यात्रा एक पहेली बन रही है जो हर वर्ष किसी ब्राह्मणी संस्कार, कुळ धर्म की तरह से निकलती जा रही है और रहेगी !!!

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Apparently right time to use Right to Call Back.
Unfortunately our so called hippopotemous skinned Leaders know that one day people may use brutely, hence they are not passing it in parliament.
Alas we would have this right to exercise, we would have thrown away this 31% pseudo majority.

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बड़ा निकम्मा राज्य है हरियाणा, ससुरे राष्ट्रद्रोही वकील है सबके सब वहाँ, सड़कों पर आ नही रहे, क्या हुआ ???
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गुर्जर, जाट, मुसलमान, पटेल, वकील, युवा, मीडिया यानि सब देश द्रोही है और कांग्रेस ने साठ सालों में जो किया उसका पाप है ये सब !!!
तो आप कर क्या रहे है दो साल से ? बहुमत में आकर भी अपने घर के लोगों को नही सम्हाल पा रहे , ना पार्टी को, तो काहे मन की भड़ास निकालने को आये थे पार्टी में, दो साल में पेट भर गया दुनिया भर में हनीमून मनाकर ?
चुप क्यों हो, ये जो संपत्ति देश में खत्म हो रही है मेरे मृतक माँ बाप की मेहनत से चुकाए इनकम टैक्स से बनी थी, मेरा भाई जो मरने तक TDS चुकाता रहा उसकी मेहनत से बनी है, मैं जी तोड़ हम्माली करता हूँ सालभर दूर दराज के इलाकों में जाकर, और तुम्हारी ऐयाशियों के लिए टैक्स नही भरता और ना इन हरामखोर उपद्रवियों के लिए जो नंगा नाच कर रहे है,
सेना को लगाकर तुम गलती कर रहे हो ठीक वैसे जैसे मच्छर मारने को हथौड़ा इस्तेमाल करते है अनपढ़ लोग। बन्द करवाओ यह नाच और हिंसा, तुम चुप रहकर बरी नही हो सकते, इतनी घटिया राजनीति अगर इस देश के हुक्मरानों का चरित्र है तो शर्मनाक है।
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जाट आंदोलन भी राजनैतिक अपरिपक्वता, घटिया राजनीति और कमजोर नेतृत्व का परिचायक है। गुर्जर, जाट जैसी अगड़ी और आर्थिक रूप से सक्षम जातियों को आप तुष्टीकरण के तहत आरक्षण का झुनझुना दोगे तो हिंसा और बढ़ेगी।
मोदी को पार्टी के भीतर कितना विरोध झेलना पड़ रहा है, राजनाथ की कमजोर पकड़, बकैती और मोहन भागवत जी आरक्षण पर की गयी टिप्पणी ने मोदी को कमजोर और मजबूर कर दिया है कि वे भाजपा के भीतर ही घुटने टेक दें और वो सब करें जो एक आदर्शहीन राजनीति मूल्यहीन व्यवस्था बनाती है।
मोदी पर अब गुस्सा नही दया आती है, भारत का सबसे कमजोर, मजबूर और दयनीय प्रधानमन्त्री जो ना निहाल चन्द्र को हटा पाया ना शिवराज को, ना संघ को दबा पाया और हर मोर्चे पर बुरी तरह फेल चाहे जे एन यु हो, दिल्ली में हार हो, पाक मोर्चे पर मात हो या ये जाट आंदोलन। अफ़सोस !!! पुरानी कहावत थी ना - जो गरजते है वो बरसते नही !!! मिट्टी के शेर,

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डरे हुए सम्पादक, मरे हुए पत्रकार और बर्बाद हो चुके चैनल्स ज़िंदा और खुद्दार नागरिक तैयार करते है, जो लोग इस बात को नही मानते वे एक बार इन तीनों में से किसी को आजमा कर देख लें ।
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देखना एक दिन ये चैनल के एंकर ही एक दुसरे की हत्या कर देंगे तनाव और प्रतिद्वंदता में आख़िरी में खुद को गोली मारकर मर जाएंगे।
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रविश कुमार अगर इसी तरह से अच्छे कार्यक्रम करते रहे तो आधे से ज्यादा पत्रकार फ्रस्ट्रेशन में मर जायेंगे और इसमें बिहार के ज्यादा है जो बनना तो खुले, लगनशील और अकादमिक पत्रकार चाहते थे, कुल मिलाकर संघी, पराजित और घटिया किस्म के दो कौड़ी के आदमी बनकर रह गए और अब जो फेलोशिप जुगाड़कर नाम कमाया था या एनजीओ की पत्रिकाओं में चमके थे और अपना पेट यहां वहाँ मुंह मारकर भर रहे थे, अब भूखे मरने की हालत हो गयी है, अखबारों में रात पाली के बन्धुआ बनकर रह गए है जो सुबह सुबह अखबारों के बण्डल बांधकर घर लौटते है।
साल भर तक कुत्तों की तरह से जुगाड़ खोजते रहते है, मुफ़्त की यात्राएं, सेमीनार, झोले, पिठ्ठू बैग्स, छोटी मोटी राशि, और जुगाड़ ताकि दारु मुर्गे का खर्च निकल सकें या किसी बरगद की चापलूसी करके घास फूस खाकर ज़िंदा रहने की कोशिश करते है। नीच कर्म करके अपने को मुख्य धारा का पत्रकार बताने में गुरेज नही करते ये दलाल !!!
ना बेचारे अंग्रेजी सीख पाये , ना IIMC नई दिल्ली में पढ़ पाये, कुल मिलाकर माखनलाल , भोपाल में रहकर मख्खन लगाना सीख गए संघी गिरोह के मास्टरों से, जिससे बीबी बच्चे पाल रहे है। अधकचरा ज्ञान, भाषा और कुपोषित दिमाग लेकर रविश को कोसते है - करें भी क्या अन्धेरा दिलों दिमाग में छाया है ।
ओम थानवी जिंदगी में बन नही पाएंगे लिहाजा सुबह शाम ओम थानवी नाम से दस्त लगते है और रविश का निमोनिया हो जाता है। आनंद प्रधान को भी इन्ही टुच्चे लोगों ने कोसा था और इनकी नानी मरती थी उनके ज्ञान के आगे। ये लोग जीवन में हॉकर के बजाय डेस्क पर बैठ गये यही इनकी उपलब्धि है।
इन पर गुस्सा नही , दया आती है !!!!
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सबसे ज्यादा शर्मनाक यह है कि राष्ट्रवाद और देश भक्ति जैसे मूल्य आधारित बातों को बहुत घटिया तरीके से परोस दिया गया और पढ़े लिखे लोग जिसमे डाक्टर, इंजीनियर, वकील, अध्यापक और बाकी भी बहुत सतही तौर पर इनके झांसे में आ गए।
क्या देशभक्ति साली इतनी कमजोर थी कि ये साले टटपूंजिये टीवी एंकर, या नकल करके लॉ पढ़ा हुआ अठन्नी का धंधा करता वकील, अपने बाप के दो नम्बर से कमाए रूपये लगाकर व्यापमं से पढ़ा हुआ डाक्टर जो मुंह काला करके विदेश भाग गया बरसों तक और धन कमाकर लौट आया और अब हमे देशभक्ति सीखाएगा ? या कम पढ़े लिखे लोग हमे सिखाएंगे देश प्रेम और अब इन टुच्चों से राष्ट्रप्रेमी का प्रमाणपत्र लेंगे जो मुंह में गाली और दिमाग में ध्वंस और दिल में माँ बहनों के साथ बलात्कार करने का सपना देखते है।
चलो मान लिया , पर जो लोग भी इस बहाने सामने आकर नंगे हुए है उनकी बौद्धिकता, समझ, पढ़ाई, डाक्टरी, तकनीकी अक्ल और देश को लेकर क्या समझ और औकात है - साफ़ हो गया।
मुझे तो अच्छा लग रहा है, भाजपा और संघ का शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने बाबरी मस्जिद से लेकर आज तक लोगों की पहचान करवाने में मदद की। इसी तरह से निर्भया काण्ड के समय भी महिला समानता और समता की बात करने वाले लोग सामने आये थे, अण्णा आंदोलन में एनजीओ और तथाकथित वामपंथी और कांग्रेसियों और समाजवादी क्रांतिकारियों की पहचान हुई थी।
सीखने के लिए इससे सस्ते और कारगर हथियार कहाँ और किसे मिलेंगे ? और इस कन्हैया ने तो सबको ही खुले मैदान में लाईन से खड़ा कर दिया, भारत की संप्रभुता, तीन सेनाएं, 125 करोड़ से ज्यादा लोग यानि मानव संसाधन - जिसमे 55 प्रतिशत युवा, बस्सी जैसे खस्सी धूर्त अफसर और सबसे ज्यादा विश्व का 56 इंची सीने वाला इतिहास में अनूठा एकमात्र प्रधानमंत्री जो दुनिया में दहाड़ता है, क्या इतने कमजोर है ये सब कि दस लोंडों से डर जाएंगे, अरे इन दस राष्ट्रद्रोहियों से तो मेरे मोहल्ले के कुत्ते ही निपट लेंगे जो पीछे पड़ गए तो, पकड़ो और एनकाउंटर कर दो वही तो करते है कुर्सी बचाने को, और इत्ता सब करके भी तुम्हारी नाक के नीचे से भाग गए , दिल्ली में तुम्हारे रमनसिंह का दंडकारण्य वाला छत्तीसगढी जंगल तो नही है ना ?
छोडो गुरु - जाटों को सम्हालो, जो तुम्हारे पड़ोस में आग लगा रहे है और तुम किसानो को फसल बीमा देने का झुनझुना बजाने की कोशिश में हो !!! शिवराज जैसे मुख्यमंत्री की पीठ पर हाथ धरते हो जो बारह सालों में भृष्ट अफसर , चपरासियों और पटवारियों का सरगना है, व्यापमं में हुई मौतों का जिम्मेदार है, खनिज घोटालों में लिप्त है। देश में तीन लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके है पिछले दो सालों में, उस पर कुछ नही कहोगे ? एक बलात्कारी केबिनेट मंत्री है अभी भी - यह कौनसा राष्ट्रप्रेम है ?
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एनडीटीवी पर अन्धेरा।
यह देखकर आपातकाल के समय खाली छोड़ दिए गए संपादकीय पृष्ठ याद आ गए।
कौन जिम्मेदार है इस सबका ? कम से कम रविश कुमार में इतनी तमीज बची है कि पूरी मीडिया में कुछ जाहिलों जैसे दीपक चौरसिया, सुधीर चौधरी, रोहित सरदाना, अर्नब गोस्वामी और सुदर्शन चैनल जैसे बिकाऊ लोग और इस तरह के लोगों के लिए उन्होंने आज अपने कार्यक्रम में अन्धेरा रखा है।
यह पश्चाताप हम सबका है और हम इस तरह के सभी चैनलों और एंकरों द्वारा किये कुत्सित प्रयासों की निंदा करते है, ऐसे सारे वकीलों की निंदा करते है जो क़ानून का खिलवाड़ करके आम लोगों में ख़ौफ़ पैदा कर रहे है।
मैं सुप्रीम कोर्ट और संविधान में पूर्ण आस्था रखते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश और राष्ट्रपति से अनुरोध करता हूँ कि तुरन्त हस्तक्षेप करके देश को और मुसीबत में जाने से, ऐसे कट्टरपंथी लोगों से, विचारधारा से बचायें ।(19 Feb)
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जाट आरक्षण कुचलकर दिखाओ और मेरे इनकम टैक्स के रुपयों से बनी संपत्ति को बचाओ। नई उम्र के बच्चों पर तो खस्सी को ढाल बनाकर बहुत नोटँकी कर ली महाराज, दम हो तो इन अगड़े और रईस जाटों को रोको ये जो राष्ट्र की सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे है यह कौन सा राष्ट्रपुण्य का कार्य है ? कमजोर, निहत्थे और तुमसे ज्यादा पढ़े लिखों पर तो बहुत गुंडागर्दी करवा ली भाड़े के अनपढ़ काले कौवों से , अब देश के विकसित राज्य के इन जाटों को कब्जे में कर के बताओ जिन्होंने आज रोहतक जैसे शांत शहर में आज तांडव किया और एक मंत्री के घर में भी आगजनी की।
वाह रे देश प्रेमियों !!! छद्म राष्ट्रवादियो !!!!

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2012 में दिल्ली में हुआ निर्भया काण्ड और ठीक चार बरस बाद कन्हैया काण्ड। भीड़ अब हर काण्ड को उत्सव की तरह लेती है चाहे अन्ना आंदोलन हो या किसी नेता की रैली।
शायद हम सीखते नही है, बातचीत के खुले मंच खत्म हो गये है, हम अपने घरों में ही बात नही कर पा रहे, समाज में, विश्व विद्यालयों में तर्क, अभिव्यक्ति, कहन के मौके खत्म हो गए है। सबसे बड़ा अफ़सोस यह है कि धैर्य खत्म हो गया है बस टूट पड़ो और भीड़ का हिस्सा बन जाओ।
अब समय आ गया है जब हर तरह के विचार, तर्क और आईडिया को युवा, किशोर और समाज के लोगों तक ले जाए, खुले मन से बात करें । लेखक , राजनैतिक लोग, प्रशासक, बुद्धिजीवी, किसान, मजदूर, पत्रकार और महिलाये भी खुले मैदान में आये अपनी बात रखें, सुने सबको, सब बोले।
अभी अनुज गैरी ( Nabil K Singh) ने यह अच्छा सुझाव दिया कि क्यों ना इस कठिन समय में हम खुले मैदान में, प्रांगणों में चर्चा सत्र रखे और जमकर बहस करें, सीखें, सबको सुनें और फिर देखें कि क्या हमारा स्तर बढ़ता है, अब भाषा की नही अभिव्यक्ति के स्तर को सुधारने और सीखने की बात है।
सबसे पहले मैं खुद खुले मन से सीखने को, धैर्य से सुनने को, समझने को तैयार हूँ। आईये हम कोशिश करें कि इस कारवां को आगे बढ़ाये।
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370 खत्म करना, नार्थ ईस्ट में शान्ति, राम मन्दिर , 15 लाख हरेक के खाते में लाना, काला धन देश में वापिस लाना, महंगाई कम करना, सबको शिक्षा, रोजगार और आवास, भ्र्ष्टाचार मुक्त भारत - ये आपके मेनिफेस्टो के पहले दो तीन पृष्ठों की बाते है, आगे अभी बहुत बाकी है।
क्या हुआ तेरा वादा, वो कसम वो इरादा ? अब यह मत कहना कांग्रेस ने क्या किया साठ साल।
छोडो मरने दो कान्हा कन्हैया और ससुरे वाम पंथियों को, देशद्रोहियों को फांसी दे दो , पर गुरु इन मुद्दों पर जवाब दो,

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