Monday, May 25, 2015

Posts of 24 May 15

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दुनिया के सारे गुलमोहर एक हो जाओ
तुम्हारी हरियाली और लालिमा के बीच अपने जर्द पीलेपन को छुपा लूँ !!!!


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बौखलाहट बड़ी जालिम चीज है 
अरविन्द में हो, राहुल में हो या मोदी में या जय ललिता में आखिर अपना ही नुकसान करती है। नतीजा देश को भुगतना पड़ रहा है !!!!


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दुनिया कविता , कहानी और उपन्यास से बदल जाती तो आज हमारी शक्ल ही कुछ और होती, बाकी आप लगे रहिये और पेलते रहिये यहां वहां से उठाकर चिपकाते रहिये , कौन पूछता है ...

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कल रात कुछ वरिष्ठ साथियों से बात हो रही थी जो मप्र शासन में जिम्मेदार पदों पर काम कर रहे है। उन्होंने बताया कि लूट का खेल जमीन से लेकर तबादलों और छोटे मोटे कामों में भी इतना घृणित चल रहा हैं कि सहसा कोई बहुत छोटा कर्मचारी भी वहाँ हाथ डालने से बचेगा। खासकरके जिला कलेक्टर जिस पैमाने पर रुपया कमाने के एजेंट बन गए है और वे जिस घटिया तरीकों से रुपया कमाकर , दस्तावेजों में हेर फेर करके और सरकार का और अपना पेट भर रहे है वह बहुत चिंतनीय है। अपनी अकड़ और तेवर में रहकर वे सारी मर्यादाएं त्याग चुके है। पिछले दस वर्षों का मेरा अपना अनुभव भी यही कहता है कि प्रदेश में हालात बहुत गंभीर हो गए है। जन सुनवाई से लेकर मुख्यमंत्री हेल्प लाईन तक की नोटंकी सिर्फ और सिर्फ नाटक है। 
शिवराज सरकार का प्रशासनिक खामियाजा इस प्रदेश को दशकों तक भुगतना पडेगा। जिला कलेक्टर के तबादले के बाद चार्ज देते समय उससे क्या क्या चार्ज लिया जाता है या उसके किये काले कामों का लेखा जोखा क्या नया कलेक्टर देखता है या क्या नया कलेक्टर पुराने कलेक्टर के द्वारा किये गए जमीन, खनिज, हथियार के लायसेंस, बड़े स्तर पर की गयी खरीदी या शिक्षा स्वास्थ्य में लिए गए निर्णयों की समीक्षा करता है या संभाग स्तर पर बैठे गोबर गणेश नुमा कमिश्नर कुछ जांच पड़ताल भी करते है या मदद करते है या अपना हफ्ता मिलने पर चुप रहते है। मप्र में जिस अंदाज में बड़े शहरों में कलेक्टर बदले गए और वो जो अपने पीछे गलत कामों और दस्तावेजों का सत्यानाश करके जाते है उसका हिसाब कहाँ मिलेगा ? पूरी व्यवस्था में कलेक्टर महज एक पुर्जा है जिले को ठीक चलाने का पर जब वह रुपया कमाने का जरिया बन जाए सत्ता के लिए तो वह सब भूलकर सिर्फ और सिर्फ सत्ता का दलाल हो जाता है। पब्लिक सर्वेंट की परिभाषा फिर से सीखिये जनाब और नही तो घर बैठिये। आपकी प्रतिबद्धता जनता से है सत्ता के सरमायेदारों से नही। शर्म आना चाहिए ऐसे दलाली करते हुए, आपसे बेहतर तो कई बार ....खैर !!! संभागीय स्तर पर जो रेवेन्यू कमिशनर बैठते है वे राज्यपाल है , गोबर गणेश है या सिर्फ भेरू है जो एक पत्थर को गेरू लगाकर किसी भी घाट की शुरुआत में बैठे होते है जो ना कुछ कर सकते है ना कुछ करना चाहते है। ये सिर्फ अपने संभाग के सिर्फ जिला कलेक्टरो की फेंकी हुई हड्डियों से अपना जीवन चलाते है और किसी भी विभाग में सचिव बनने के पूर्व काला पानी की सजा भुगतते है। कुल मिलाकर प्रशासन के कलंक और जनता के रुपयों से पल रहे ये मात्र प्रशासनिक ढोंग और बड़ा बोझ है। सुबह लिखी मेरी पोस्ट पर एक बुजुर्ग साथी ने कहा कि तुम पर तरस आता है क्योकि यह काम कलेक्टर वीरेंद्र सखलेचा या प्रकाश चन्द्र सेठी या सुंदरलाल पटवा या कैलाशनाथ काटजू या अर्जुन सिंह के समय दिग्विजय के समय भी कर ही रहे थे, रुपया कमाकर नेता को देने का तो अब शिवराज के समय करके मुख्यमन्त्री को दे रहे है तो गलत क्या है? हाँ अर्जुन सिंह से आज तक राशि बढ़ गयी है लेन देन में क्योकि "क्वांटम" बढ़ गया है! यानि कि शिवराज हो या दिग्विजय - ये सब एक ही है और कलेक्टर तब भी भृष्ट थे और अब भी तो क्या फर्क पड़ा ? अभी पूर्व प्रमुख सचिव स्वास्थ्य, प्रवीर कृष्ण के करोड़ो रूपये के घपलों को लेकर लोकायुक्त जांच कर रहे है जो मुख्य मंत्री के चहेते अफसर थे और प्रदेश के मरीजों को कूड़ा कचरा उन्होंने जरूरी दवाईयों के नाम पर प्रदेश की जनता को तीन साल परोसा ।


हम भृष्टन के , भृष्ट हमारे !!!!


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आज बहुत दुखी हूँ . ग्वालियर में युवाओं के एक समूह के साथ हूँ तीन चार दिन से. ये सब पढ़ रहे है पर इन्हें ना BE, LL B, BCA, या X , XII का मतलब मालूम या स्पेलिंग भी नही आती.बहुत गहराई से बात की तो ये सब शर्मिन्दा है और अफ़सोस कर रहे कि अंतिम वर्ष में आ गए पर ज्ञान या विषय के नाम पर कुछ नही आता. यह जो साजिश हो रही है कि बच्चों को शिक्षा में रखो पर ज्ञान मत दो यहां तक कि उन्हें लिखना पढ़ना भी मत सिखाओ, और जब जनता मूर्ख रहेगी , मूल कौशलों और दक्षताओं से दूर रहेगी तो भ्र्ष्टाचार को बढ़ावा ही मिलेगा! जम्मू काश्मीर से शिक्षक के खिलाफ जो एफ आई आर हुई , वह सही है । मेरा बस चले तो इन बच्चों के शिक्षको को जिन्होंने इन्हें ग्वालियर जैसे शहर के स्कूल में पढ़ाने के नाम पर धोखा किया उन्हें लाईन से किसी चौराहे पर लटकाकर सरेआम गोली मार दूँ ! बहुत हो गया अब ! कब तक हम मूल बातों को भूलकर फ़ालतू की बाते करते रहेंगे ? 


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