Thursday, August 2, 2012

एक बार फ़िर फराज.................



 

मेरे सब्र की इन्तेहा क्या पूछते हो फ़राज़
वो मेरे गले लग कर रोया किसी और के लिए.

हम जमाने में यूँही बेवफा मशहूर हो गये फराज,
हजारों चाहने वाले थे किस किस से वफ़ा करते !


ताल्लुक तोड़ने का कहीं जिक्र भी करना न "फराज़"
मैं लोगों से कह दूंगा कि उसे फ़ुरसत नहीं मिलती ...
खुद को चुनते हुए दिन सारा गुज़र जाता है फ़राज़
फ़िर हवा शाम की चलती है तो बिखर जाते है

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