Sunday, August 19, 2012

सबको ईद मुबारक....

सबको ईद मुबारक....

 
 
लों आखिर एक माह के रोज़े, नमाजों और दुआओं के चलते ईद आ ही गई, ईद को लेकर बचपन से एक उत्साह रहता था ना मात्र सिवैया खाने की ललक बल्कि सबसे मिलने जुलने की बेकरारी, मोहल्ले भर में घूम घूम कर सबको ईद मुबारक कहना और ईदी इकठ्ठी करना और फ़िर दोस्तों के साथ फिल्म देखने जाना, हर बार हामिद कही ना कही जेहन में रहता था और बड़ी मस्जिद के बाहर लगे मेले में चिमटा दिखते ही मन में टींस सी उभर जाती थी. आँखें खोजती थी कि कही कोई हामिद दिख जाये तो जेब खर्च और साईं ईदी उसे दे देंगे हम सब दोस्त ...........देवास की टेकडी से चढ़कर राधागंज की मस्जिद में झांकते थे कि हजारों सर कैसे सजदे में झुकते है और मै देखता था कि कहा से हजारों बिजली के लट्टू की उपमा प्रेमचंद ने ली होगी? बड़े हुए तो साथ पढ़े दोस्तों के घर पुरे रमजान माह में आना जाना होता, रात में तराबी सुनते थे और कोशिश करते कि मुँह से गाली ना निकले और किसी के लिए बुरे ख्याल ना आये. भले रोजे ना रखे पर खाने और अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखें, ईद पर दूर शहरों में काम करने वाले दोस्त देवास आ जाते तो साथ बैठकर ढेर सारी बातें तसल्ली से करते. देवास में स्व नईम जी, स्व अफजल सर के यहाँ हर साल ईद पर जाते ही थे और खूब सारा खाते थे और आते समय जिद से अपनी ईदी लेकर आते थे.

धीरे धीरे सब छूट रहा है अब ईद, दीवाली, क्रिसमस, पतेती या गुरुनानक जयंती केवल औपचारिकता जैसे लगने लगे है हालांकि जोश अब भी है पर बाजार, महंगाई, रिश्तों के तल्ख्पन और दूरियों ने सबको बहुत सीमित कर दिया है पर हौसला है अभी जवाँ कि अभी बहुत कुछ है भले ही हामिद साक्षात ना हो पर चिमटा और सजदे में झुके सर याद दिलाते है कि इबादत, भाईचारा, मेलजोल, अपनत्व और रिश्तों के कोमल तंतुओं से जुड़े हम लोग त्यौहार मना रहे है वो भी दिल से.......चाहे ईद हो या दीवाली........
बहरहाल सबको ईद मुबारक और दुआएं है कि यह त्यौहार हम सबके लिए खुशियाँ, तरक्की और नई उम्मीदों के नए रास्त खोले .........आमीन.........

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