Friday, August 5, 2011

निशांत की एक कविता

निशांत की एक कविता


निशांत - 9239612662

निशांत की यह कविता परिकथा मई-जून, 2010 में छपी थी। निशांत बहुत समय से कविता लेखन में सक्रिय हैं और कविता के लिए उन्हें प्रतिष्टित भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, 2008, शब्द साधना युवा सम्मान, 2010 और प्रथम नागार्जुन कृति सम्मान, 2009 मिला है। कविता की एक किताब जवान होते हुए लड़के का कबूलनामा ज्ञानपीठ से प्रकाशित हो चुकी है। निशांत फिलहाल जेएनयू में पीएचडी कर रहे हैं।
यह कविता प्रेमचंद की जयंती (31 जुलाई) पर विशेष। बहुत जल्दी निशांत की और कविताएं आप पढ़ सकेंगे।




प्रेमचंद को पढ़ते हुए

हमारे नाम के भीतर
बैठे होते हैं हमारे पुरखे
उनकी स्मृतियां
हमारी सभ्यताएं संस्कृतियां इतिहास
और कभा-कभी उनका भूगोल भी

क्यों किसी का नाम
गोबर धनिया फेंकना मिठइया होता है
जबकि वह सीधा-सादा सरल-सा होता है
दिखता भी है एकदम वैसा ही

ये सारे नाम वहीं से आते हैं
जहां मिट्टी पानी से सना रहता है हाथ
धूप से भीगा रहता है सर

नामों के पीछे काम करती है
एक गहरी-काली साजिश
बहुत-बहुत समय पहले की साजिश

आज भी बचे हुए हैं ढेर-ढेर नाम

किसी वैदिक मंत्रों की खोज में
उद्धाटित किया होगा उन्होंने यह सूत्र वाक्य
कि उनकी आत्मा पर चिपका दो यह नाम
और कहते रहो नाम में क्या रखा है

नाम से खोलते हैं वे एक ताला
एक तिलिस्म
एक सभ्यता
एक संस्कृति
एक इतिहास
और दाखिल हो जाते हैं
आत्मा के गह्वर में टपके ताऊत की तरह

एक नाम लेते हैं वे
सबकुछ स्पष्ट दिखने लगता है उन्हें
नाम नहीं एक मंत्र बुदबुदाते हैं वे
खड़ी कर लेते हैं अपनी अयोध्या

हमारा सारा रहस्य
हमारे उजबक से नामों में छुपा है
धर्मांतरम करने से ज्यादा जरूरी है नामांतरण करना

वे कहते हैं नाम में क्या रखा है

नाम बदलना
एक पूरी सभ्यता पूरी संस्कृति
और कभी-कभी एक पूरा इतिहास बदलना ह

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