Friday, August 19, 2011

मन की गांठे

मन की आवारगी को समझते हुए कितनी दूर आ पहुंचा हूँ पर आज भी यह समझ नहीं आया कि ये सब क्या और कैसे हो गया, ऐसा सोचा तो नहीं था कभी सपने में भी फ़िर हकीकत का जिक्र करना तो पाप जैसा है जितना सोचता हूँ मवाद भरता जाता है दिल दिमाग में और लगता है कानो से टपकने लगेगा. मन उन्मुक्त आवारा की तरह सोचता है और फ़िर विचित्र से अपराधबोध, गुबार, संताप निकलने लगते है व्याकुलता इतनी बढ़ जाती है कि शरीर पर ज्वर का प्रकोप चढ जाता है हाथ पाँव निर्जीव होकर निढाल हो जाते है समझ का फेर क्या से क्या कर देता है और पूछता हूँ बार बार खुद से "तेरा मेरा मनवा कैसे एक होए रे.."(मन की गांठे)

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