Wednesday, August 31, 2011

लड़ झगडकर ईदी लेते थे

सबको ईद की ढेरो शुभकामनाएं.........................देवास की याद आ रही है जब दोस्तों के यहाँ धमाल करते थे ओर फ़िर आख़िरी में नईम जी से लड़ झगडकर ईदी लेते थे वो एक एक रूपये के सिक्के अभी भी सम्हाल कर रखे है मुसीबत के दिनों केलिए पर उनकी बरकत यह है कि इंशा अल्लाह मुसीबत कभी आयी ही नहीं अभी तक ओर खुदा करे कि कभी ना आयें.....आप सबको को भी एसी सुबह कभी ना देखना पड़े यही दुआ है..................कहते थे "सुल्ताना ये ईदी मांगने आये है दे दो इन्हें पता नहीं क्यों गरीब मास्टर से माँगने आ जाते है ओर खा पीकर चले जाते है ओर फ़िर बहुत प्यार से सिवाई, ओर ना ना प्रकार के व्यंजन लाते ओर अपने हाथो से खिलाते ओर कहते अब पेट भर खा लो घर जाकर खाना मत खाना समीरी ओर ले आ" ओर तनवीर बेचारा किचन से लाते रहता था........फ़िर अपने लखनवी कुर्ते की जेब से एक एक के सिक्के निकाल कर देते थे ओर पूछते कि क्या लिखा पढ़ा इन दिनों........दीदी भी खूब मजेदार खाना बनाती है यह हम ईद पर समझ पाते थे अब देवास में रौनक ही खत्म हो गयी है ना नायीम्जी रहे ना बाबा (कुमार जी) ओर बस.........मन ही उचाट हो जाता है तीज त्योहारों पर..........

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