Wednesday, August 3, 2011

मन की गांठे

जीवन में जब भी फूल देखे पत्तिया देखी लगा कि सब कुछ खुशहाल है और सब तरफ सावन बसंत और मधुमास है उजले आसमान पर पक्षियों के कलरव सुनकर मन प्रफुल्लित हो उठता है दूर तक फ़ैली हरियाली की चादर ओढ़े अवनि अपने यौवन पर लजाती मुस्काती है शफक का सूरज जाते हुए कह जाता है कि कल सुबह फ़िर लौट रहा हूँ एक नई आभा और उम्मीद के साथ पर अमावस की काली रात सब धे देती है जैसे खत्म हो जाते है पेड़ पतझड़ में और रीते रह जाते है मन जेठ की दुपहरी में, कहाँ हो तुम(मन की गांठे)

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