Tuesday, August 2, 2011

मन की गांठे

जीवन में अकेले चलते हुए हम पाते है कि कई लोग साथ देते है और समय के साथ छूटते चले जाते है पर कुछ लोग छोडकर भी नहीं छूट पाते वो चिपके रहते है जैसे गर्भनाल से लटका हुआ महीन सा धागा जो एक जीवित अजीवित के बीच सम्बन्ध सेतु का कार्य करता है, जीवन के अकेलेपन में यही लोग हमारे साथ होते है पूरी शिद्दत के साथ वो छोड़ जाए हमें पर हम नहीं टूट पाते है उस बंधन से जो कभी टूटने के लिए बना ही नहीं था हाँ इसमें क्षीण जरूर हो जाते है पर मिटा नहीं पाते और एक अनिर्वचनीय जुड़ाव का एहसास लगातार बना रहता है(मन की गांठे)

No comments: