Wednesday, August 3, 2011

मन की गांठे

घटाटोप अँधेरे में जब भी आसमान पर बिजली चमकती है लगता है यह मन फ़िर उचाट हो रहा है दूर दूर तक सिर्फ एक अन्धेरा और कही चमक और फ़िर बहुत देर बाद आवाज की झनझनाहट सुनाई देती है सिर्फ एक ही क्षण की बात लगती है इस पार और उस पार में लगता है सब बाँट दू और इस अंधेरी सुरंग में अज्ञात प्रवास पर निकल पडू क्योकि अब समय आ गया है चेतना विलुप्त हो रही है सघनता बढ़ रही है विरलता का कोइ नामोनिशान नहीं है और एक खुमारी बस स्वप्न और उमंगें हिलोरे ले रहे है उस पार की कशिश बरकरार है(मन की गांठे)

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