Tuesday, August 23, 2011

मन की गांठे

सूर्यास्त के बाद दिन खत्म हो गया था ओर सांझ ने अपना आँचल पसराना शुरू कर दिया था जो गहरे तिमिर तक जाकर रूकी, स्तब्धता ओर नीरव सन्नाटे के बीच ये कैसा शोर था ये कैसी आवाजें थी जो बेचैन कर रही थी दूर से कही आता शोर- उथल पुथल मन को बहुत अशांत कर रही थी कही से भी एक पत्ता नहीं खटक रहा था कि उसका सहारा मिल जाए बस एक जुगनू अपनी तीव्र आवाज के साथ व्योम में घूम रहा था जैसे मन के किसी कोने में तुम रहते हो ओर हरदम राह दिखाते रहते हो, रात गहरा रही थी ओर विभावरी तक साँसे कैसे आई यह नहीं जानता(मन की गांठे)

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