Friday, August 19, 2011

अवतार सिंह पाश की एक बेहतरीन कविता

जीने का यही सलीका होता है

प्यार करना और जीना उन्हें कभी आएगा नहीं

जिन्हें जिन्दगी ने हिसाबी बना दिया

जिस्मों का रिश्ता समझ सकना-

ख़ुशी और नफरत में कभी लीक ना खींचना

जिन्दगी के फैले हुए आकार पर फिदा होना

सहम को चीर कर मिलना और विदा होना

बहुत बहादुरी का काम होता है मेरी दोस्त

मैं अब विदा होता हूं तू भूल जाना

मैंने तुम्हें किस तरह पलकों में पाल कर जवान किया

कि मेरी नजरों ने क्या कुछ नहीं किया

तेरे नक्शों की धार बांधने में

कि मेरे चुंबनों ने

कितना खूबसूरत कर दिया तेरा चेहरा कि मेरे आलिंगनों ने

तेरा मोम जैसा बदन कैसे सांचे में ढाला

तू यह सभी भूल जाना मेरी दोस्त

सिवा इसके कि मुझे जीने की बहुत इच्छा थी

कि मैं गले तक जिन्दगी में डूबना चाहता था

मेरे भी हिस्से का जी लेना

मेरी दोस्त मेरे भी हिस्से का जी लेना।


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