Thursday, February 28, 2013

आपने सिक्कों की खनक सुनी है ?

वो सिक्के ही थे दस, पांच, तीन और दो पैसों के
जिन से दो चार होकर बड़ा हुआ मै
जवाहर चौक पे खडा होकर दिया था भाषण
जब तुतलाती जुबान से तो माँ ने
हाथ में धर दिया था तीन पैसे का सिक्का
सड़क पर जाते मैयत से उठाया था
एक पांच पैसे का सिक्का
उस्ताद रज्जब अली खां साहब मार्ग, देवास  के
किसी सेठ के मरने पर तो
बहुत मार खाई थी पिता से
महेश टाकीज़ में पतिता फिल्म के गाने पर भी
भर गई थी जेब सिक्कों से
जिन्हें बीन लिया था जमीन से
उस भीड़ भरे टाकीज़ में
और फ़िर घर आकर गर्व से बताया
तो फ़िर मार खाई पिता से
कितना कुछ आ जाता था उन छोटे सिक्कों में
चाय की पुड़िया, मीठा तेल, मेहमानों के लिए पर्याप्त शक्कर
दूध, हर इतवार की जलेबियाँ, एक पॉलिश की डिब्बी,
बुखार की गोली, भगवान के लिए हार
शायद पूरा संसार उन दिनों 
इन्ही छोटे सिक्कों से खरीदा जा सकता था
बात पुरानी तो जरुर है पर सच है
धीरे धीरे बड़े सिक्के आये 
चार आने, आठ आने के तो भाषा ने 
भी अपने अर्थ बदले और सिक्कों में ढली  
कहावतें बनी कि सोलह आना सच
चवन्नी की औकात वाला आदमी
आमदनी अठन्नी खर्चा रूपया
खरे सिक्के वाला आदमी 
खोटा सिक्का और ना जाने क्या-क्या
आज सोचता हूँ तो दिखाई नहीं पड़ते
वो पीतल के चमकते सिक्के
शुभ्र धातु में ढले दमकते सिक्के
वो सिक्के जिन्हें माँ चांदी के भुलावे में
हर लक्ष्मीपूजा के समय धर देती थी और
बुदबुदाती थी कि इस घर से और 
हमारे पुरे बाड़े में रहने वालों के घर से दलिदर का कलंक मिटें
और लक्ष्मी अपने वरद हस्त के साथ टिकी रहे
इस हजार रूपये के दौर में
उन सिक्कों की खनक कही नहीं सुनाई देती
जिनके होने पर मन शांत रहता था
और एक आश्वस्ति बनी रहती थी जीने की
जेब में सिक्के खनखनाते तो लगता कि
जीवन संगीत में बसंत - बहार है
और सारे सुर सधे हुए है
सिक्के बजते तो लगता कि जीवन की गाड़ी 
बिलकुल सीधी है और कही क्लेश नहीं 
आज जेब में नोटों के पुलिंदे होते है कई बार 
दुनिया की एक छोटी सी चीज़ भी नहीं खरीद पाता हूँ मै
कितना बेबस पाता हूँ कि इन ढेर सारे नोटों से 
एक छोटी सी चीज नहीं ले पा रहा किसी के लिए
बढती और विराट होती दुनिया के लिए 
भारी और बड़े नोट कितने छोटे हो गये है 
कोई कहता है नोटों की कीमत कम हो गई है 
यह  कोई नहीं कहता कि इन नोटों के नीचे दबा 
आदमी भी किसी लायक नहीं रहा बाजार में 
सब बिक रहा है, सब खरीद रहे है, सब बिकाऊ है 
कही से सुनाई नहीं देती गूँज उन सिक्कों की 
जिन्हें देखते ही मन प्रफुल्लित हो जाता था
इस समय में आज भी खोजता हूँ उन सिक्कों को
अनथक प्रयास जारी है , बहुत मन है एक बार फ़िर 
लौट जाऊं बचपन में और खोज लूं  अपने सारे सिक्के 
और फ़िर खरीद लूं चाँद सितारे आसमान और वो सब 
जो आज इन भारी नोटों से नहीं खरीदा जा सकता है.

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