Thursday, February 28, 2013

आधी धरती अँधेरे में थी वहाँ


लगा तो नहीं था कि ये तुम हो 
लगा तो यह था कि यह तुम ही हो
अपनी आवारगी पर मैंने कभी
सोचा ही नहीं और सहजता से कह दिया 
तुमने  कि जो अपना नहीं हो सकता 
वो किसी का नहीं हो सकता 
और फ़िर तुमने वो सब याद दिलाया 
जो घटित हुआ था किसी कोने में 
इसी धरती के एक कोने में 
नि:शब्द था मै और भोथरा गया 
बेबस सा सोचता रहा क्या कहूँ 
यह एक प्रेम की शुरुआत थी या अंत 
मुझे नहीं पता पर उस सबको याद 
करते हुए मुझे सिर्फ यही लगता है 
जीवन में प्रेम कभी पूरा नहीं होता, 
होता तो प्रेम भी नहीं कभी पूरा 
पर एक आदत सी पड़ जाती है 
धरती, चाँद और सितारों के बीच से 
जिंदगी को निकालने की बगैर 
यह जाने कि सबकी अपनी अपनी 
कहानी होती है बगैर यह जाने कि
अक्सर वहाँ धरती आधी अँधेरे में थी

(जानती हो ना आज ये कविता तुम्हारे लिए है)

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