Thursday, November 1, 2012

मिल लेने से मिलना थोड़े ही हो जाता है

गया तों बहुत दूर था कि एक बहुत पुराना सा, बहुत मीठा सा, बहुत भावुक सा रिश्ता बन गया था इन छः बरसों में, कितने-कितने देर तक हम यूँही बोलते रहे थे, फोन पर, चेट पर, सब कुछ बाँट चुके थे... पर कुछ था जो रह गया था बांटने से, कुछ था जो रह गया था सुना-अनसुना, कुछ था जो कह नहीं पाए थे........बस इसलिए चला गया था अपने छोटे से जीवन के पुरे तीन दिन देने, गया तो था कि ये करूँगा, वो करूँगा पर जाकर पता चला कि एक पनौती ही हूँ बस यूँही लौट आया बगैर कुछ बोले, समझे जाने बूझे....अब लग रहा है कि जीवन के तीन दिन व्यर्थ चले गये और बस......खैर अब कुछ हो  नहीं सकता........ यह शरद पूर्णिमा की रात थी और वो असंख्य सुबहों का सूरज सारे वादे करके भी नहीं आया लिहाजा मन मसोज कर लौटना ही था बस सारे रास्ते पटरियों का दर्द देखता रहा और फ़िर सीखा कि साथ-साथ चलने से कोई साथ थोड़े  ही होता है, बात करने से कोई अपना थोड़े ही हो जाता है, भावनाएं बांटने से मन का मीत थोड़े ही हो जाता है, और मिल लेने से मिलना थोड़े ही हो जाता है, दूर तक यात्रा करके जाने से कोई पहुँच थोड़े ही जाता है. बावला है मन भी और मै भी बस- थोड़े ही में बहक जाता है, खैर विश्वास जो था वो टूट गया!!! यह सबसे बड़ी आश्वस्ति है और सीख जो मिल गई वो शायद कभी मेरे या किसी के काम आ जाये. उन जंगलों के सर्द सन्नाटों में गूंजती हुई आवाजों के घेरे अभी भी परेशाँ कर रहे है और उन पहाड़ों की चोटियाँ याद आ रही है अभी भी.........कि कोई कैसे कह दें कि सब कुछ खोकर लौटा था इन तीन दिनों में......

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