Thursday, November 22, 2012

नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथा 16

आज फ़िर वही नदी है वही पानी, वही उद्दाम वेग, वही धाराएं, वही बहाव, वही उठती-गिरती-पडती लहरें ........सब कुछ गुत्थम गुत्था, आपस में और ऐसे बिखरे और उलझे हुए मानो शब्दों का कोई जाल हो जहां हर कोण से एक नया अक्स उभरता हो.........चारों ओर रेत ही रेत है किनारे पर, किनारे पर पसरी आदमियत की गन्दगी और सदियों से बोझानुमा ढोती हुई ये रेवा कहाँ से इतनी शक्ति ले आई है कि इस सबको अपने अंदर समेट कर बहती जा रही है. दूर कही सूरज डूबने की पुरजोर कोशिश कर रहा है...........लालिमा भी कोने में जाकर दुबक गई है झुरमुट में. सब कुछ अँधेरे में होने को है और एक लाश आई है अपने जीवन की पूरी परिक्रमा करने के बाद और अब यह मनुष्य योनी भी खत्म हो गई आज. जो साथ आये है उसके परिजन है एक भाई है जो बेहद अशांत और उद्दीप्त है पता नहीं क्या बडबडा रहा है कह रहा है "बेबी को ऐसा नहीं करना था .............मालूम नहीं पड़ा किसी को, सामने रहता था और यह सब कैसे हो गया, यह घाट के उस छोर का मकान था जहां मोहल्ले की गली का कोना बंद हो जाता था और फ़िर शुरू होता था भय, जुगुप्सा और घृणा का विस्तार.....बस हमारी बेबी वही धंस गई उसके साथ इस सामने वाले कमीने ने कही का नहीं छोड़ा हमें......कब यह मोहल्ले के रिश्ते गले के उस बंद कोने में जाकर एकाकार हो गये और बेबी के भीतर एक जिंदगी जन्म लेने लगी......कल यानी उसके जीवन की आख़िरी रात को सबके साथ देर तक वो टीवी देख रही थी, पाँव से पायल उतार कर उसने भाभी को दे दी और कहा कि अब तो हो गई है दीवाली, छनछन से घर में कोहराम मचता है और मेरे कानों में कुछ और ही गूंजता है......."  लाश के साथ आये लोग लकड़ी जमा कर रहे थे घी, आटा, काले तिल, जौ, पूजा की सुपारी, हार-फूल, चन्दन, पान का बीड़ा, जैसी तैयारियां चल रही थी लाश के मुँह में पान का बीड़ा ठूंसा जा रहा था. भाई लगभग विक्षिप्त अवस्था में फ़िर तेज आवाज में सामने वाले को ललकार रहा था कि साले ने हमें कही का नहीं छोड़ा, सात भाईयों में यही सबसे घटिया निकला और हमारे खानदान पर ऐसा छींटा मारा है कि यह दाग सात पुश्तों तक नहीं धुलेगा....और बेबी उसे क्या पडी थी......कम से कम बता तो देती, कल रात जब अपनी पायल उतार रही थी तो कितनी गहरी हो गई थी उसकी आँखें और धंस गई थी गहरे भीतर, ना जाने कितने दिनों तक वो बर्दाश्त करती रही यह सब, हार गई होगी उसे समझाकर तब कही एक साथ दो जीव ह्त्या का पाप अपने सर लेना स्वीकार किया होगा........सब के सब बहरे हो गये थे ऊपर टीवी देखते हुए...क्या एक आह भी नहीं निकली होगी बेबी के मुँह से एकदम से झूल गई रस्सी पर और जब माँ ने खोला कमरा तो सीधे माँ की गोद में ही जा गिरी......यह एक वज्राघात था, सन्निपात था.... हम जैसे लोगों के लिए जो कभी अपनी इज्जत को ही सबसे ज्यादा मानते थे और आज भी मानते है, पर बेबी यह तूने क्या कर दिया.......कल तो मै भी पागल था और खूब गलियाता रहा उसकी देह को और आवेश में आकर एक लात भी जड़ दी थी उसके पेट पर तभी खून का स्रोता बह निकला था......एक मांस का लोथडा .........और यकीन मानो वह देखकर सारा माजरा समझ आया था....... ओह.........मै भी जानवर बन गया.....पर खेल तब समझ आया जब इसी बंद गली के आख़िरी कोने में बसे हमारे घर के सामने वाला वह गायब हो गया.......बेबी के पास से कुछ मिला था हाथ की मुठ्ठी में कुछ दबा सा पड़ा था.......आज सुबह पोस्टमार्टम के बाद यह मोहल्ले में हवा की तरह फ़ैल गया सब.......और अब सब कुछ करते- करते शाम हो आई है.........ये रेवा नदी ने कोई सुख नहीं दिया साहब, कोई सुख नही दिया, जब भी दिया आंसू और ग़म ही  दिए है .....लाश धू-धू कर जलने लगी है साथ आये लोग शांत होकर बीडी पीने लगे है और गप्प लगाने लगे है और कपाल क्रिया के बाद सब नर्मदा के जल में नहा रहे है भीगे बदन और फिजां में एक ही आवाज गूँज रही है नर्मदे हर, हर, हर..........(नर्मदा किनारे से बेचैनी की कथा 16)

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