Friday, September 9, 2011

प्रशासन पुराण 29

मुझे समझ नहीं आता कि जिन जनप्रतिनिधियों को गाँव में रहकर काम करना है 73 वे संशोधन अधिनियम के तहत वे रोज रोज मेरे दफ्तर में आते है बाबूओ से गप लड़ाते रहते है फ़िर दूसरे दफ्तर जाते है ओर यही क्रम चलता रहता है, इन्हें कोई मानदेय नहीं मिलता करीब 90 या 145 किलोमीटर से आते है गाड़ी या बाईक से और सबको चाय पिलाते है नाश्ता कराते है यह सब कहा से आता है और मजेदार यह है कि महिला सरपंच भी पति,पुत्र या भांजे के साथ आती है सज संवर कर....विकास् हो गया है(प्रशासन पुराण 29)

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