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27 बार हुआ सांसदों के वेतन-भत्तों में संशोधन और गरीब के लिए 'गरीब" ही रही सरकार

योजना आयोग के जरिए केन्द्र सरकार ने जो गरीब होने की परिभाषा तय करने वाला का हलफनामा दिया है उसे पढ़ कर एक मित्र राहुल गामोठ ने तंज किया-'योजना आयोग के कर्ताधर्ताओं को कह दो कि वे अपना वेतन 1000 रूपए तय कर लें और शहर में गुजर कर के दिखलाए। राहुल ने कहा कि आयोग ने 965 रूपए बताया है हम तो उन्हें 35 रूपए ज्यादा दे रहे हैं।"
'माननियों" के प्रति राहुल जैसे देश के तमाम लोगों को गुस्सा और बढ़ेगा अगर उन्हें पता चले कि 1954 के बाद से अब तक सांसदों के वेतन और भत्तों में 27 बार संशोधन हो चुका है। 2005 में उनका वेतन 12 हजार था जो अब 50 हजार रूपए प्रतिमाह है। जबकि 2004 में की दर से हर माह 579 रूपए कमाने वाले को बीपीएल माना गया था जिसकी सीमा बढ़ कर आयोग ने 965 रूपए कर दी है।

गरीब कौन है? वो सांसद जिस पर वेतन के साथ करीब 15 सुविधाओं के लिए सालाना करीब 45 लाख रूपए खर्च होता है या वो गरीब जो माह में पाँच हजार की कमाई करता है? सरकार हमेशा ही आँकड़ो में विकास नापती रही है अमीरी-गरीबी को भी आँक ड़ों की बाजीगरी में उलझा दिया है। ज्यादा समय नहीं हुआ। अगस्त 2010 में हमारे सांसद इस बात से नाराज थे कि कैबिनेट ने उनका वेतन केवल 50 हजार क्यों किया, जबकि वेतन 16 हजार से बढ़ा कर 80 हजार किया जाना था। इस बात पर खूब एसएमएस चले और लोगों ने संसद की कैंटिन में रियायती दल पर मिलने वाली खाद्य सामग्री की सूची पेश कर डाली। गरीबों की 'अमीरी" बताते योजनाओं आयोग के हलफनामे के दौरान हमने सांसदों की थाली से गरीब की थाली की तुलना की तो पाया कि गरीबों की दयनीय हालत स्वीकार करने में भी हम उदार नहीं है। संसद में कैंटिन के लिए कुल 5.3 करोड़ का बजट आवंटित है। यहाँ सांसदों को रियायती दर पर मात्र 12 रूपए 50 पैसे में भरपेट खाने को शाकाहार सब्जी मिल जाती है। इस खाने की गुणवत्ता पर शक करना बेकार है लेकिन एक गरीब मजदूर को बस स्टैण्ड या रेलवे स्टेशन के पास की किसी छोटी सी दुकान पर भी 20 रूपए से कम में भोजन नहीं मिलेगा।

पंकज शुक्ला , भोपाल ........

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