Tuesday, September 6, 2011

कैसे कह दू कि तुम नहीं हो - नीरज वशिष्ठ

ईश्‍वर अगर फूल है, वृक्ष है, सखी की याद है, सूरज की रोशनी है, चांदनी की बरसात है, तुम्‍हारा ख्‍याल है, नदियों की कल कल नाद है, तो मैं उसमें विश्‍वास करता हूं क्‍योंकि यह मेरे अनुभव से आता है, यह मेरी अनुभूति का हिस्‍सा है। इस अनुभव के बल पर ही मेरा जीवन प्रार्थना और यज्ञ में तब्‍दील हो जाता है और आंखों के सामने हर क्षण तुम ही नजर आते हो। कैसे कह दू कि तुम नहीं हो।

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