Friday, September 30, 2011

सुशील कृष्णेत के सौजन्य से

Had Sushil Krishnet would nt have published I would nt have been able to read such a nice work. Thanx a ton Sushil.............

तुम्हारी आंखों में कभी नहीं पड़ते
आसक्ति के लाल डोरे
फूंकते हुए चूल्हा, दहकाती हुई आग
तुम सीने में भर लेती हो
दो मुट्ठी चिंगारी
और सांसों में राख...
जलाकर अपना जीवन
हर दिन परोसती हो तुम चार रोटियां
नयनों में भरे आंसुओं से शायद
सान लेती हो आटा
...
तुम्हें नहीं चाहिए कभी कोई प्रेमगीत
नहीं कोई गवाही प्रेम के सच्चे होने की
कहां मांगी तुमने करधन या पायल
कमर में बंधे हाथों को ही जेवर समझ होती रहीं धन्य
स्त्री,
तुम्हारे होने में न वसंत है, न कविता
न ही कोई ललक
पर तुम्हारे बिना कोई मौसम हुआ है कभी मुकम्मल
पत्नी का प्रेयसी न होना
और प्रेमिका का पत्नी न बन पाना
नियति है इसी तरह की,
जैसे--अनिवार्य सत्य हमेशा फांसी झूलता है
और झूला झूलते हुए हम भुला देते हैं हर बार दंगों को
...
होने वाली पत्नी या न हो सकी प्रेमिका को याद करते हुए
कविता गढ़ना
धूप में खटाई सुखाने की तरह है
या फिर
बारिशों के डर से आनन-फानन लाज बिछाते हुए
नंगे पैर सारे पैरहन समेटना...
घर की औरत में अलंकार तलाशना
या फिर विक्षिप्त भाव से गुमशुदा प्रेम को अडीगना
हर जीवन मुकम्मल नहीं होता
न ही वसंत टिके रहते हैं
फिर भी हममें नाखुश रहने की बीमारी है
शुक्रिया कहते हुए दोष गिनाने
और खुशी में तुनक जाने की पारंपरिक आदतों की तरह...

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