Friday, September 9, 2011

मन की गांठे

दरअसल वो अपने आप से ही परेशां था ओर बस त्वरित निर्णय उसे जिंदगी में बहुत भारी पड़ते थे जानते बूझते हुए भी वो लगातार खेलता रहता था जिंदगी से ओर इस बीच वो कब ऐसा हो गया कि उसे पता ही नहीं चला शरीर बीमारियों की खान दोस्तों के नाम पर ऊबे थके हुए लोग ओर परिवार के नाम पर निष्कासित जीवन बस ऐसे में एक समूह से जुडा पर वहा भी आदमखोर लोगो से पाला पडा ओर फ़िर वो गर्त में ही चला गया, सबसे दुश्मनी ले ली ओर अनायास ही एक दिन वो एक ऐसे कोने में पहुंचा कि बस ओर ना छोर(मन की गांठे)

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