Friday, September 23, 2011

मन की गाँठे

अपने लोगो से बात करना बेहद मुश्किल होता है जैसे उन्हें चिट्ठी लिखना जैसे उनसे यह पूछना कि कैसे हो, यह और भी मुश्किल तब हो जाता हो जब हम खुद संतापो से घिरे हो और बेहद त्रासद हो आसपास, कही आशा की किरण नजर ना आ रही हो, दूर राहों पर पेडो की छाँह तो दूर मृगछाया भी नजर नहीं आती हो. अपने लोगो का अपना एक संतुलित समीकरण होता है जिसके बराबर एक साथ कई पहलू होते है और अक्सर हम इन सबको समग्र रूप से संवारने में उलझ जाते है बस यही से सारा क्रम बिगडाना शुरू होता है और एक रपटे पर फिसलते हुए जिंदगी दो कौड़ी की रह जाती है! बस यही आइना है यही सच है और यही अपने हमसे इतनी दूर चले जाते है कि फ़िर लौट कर नहीं आते शायद लौटना तो हमें भी है, हम उस खुसरो को याद करते है जो कहता था "चल खुसरो घर आपने रैन भई चहुदेस"(मन की गाँठे)

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