Friday, September 23, 2011

मन की गाँठे

लगता है कि जीवन एक बेचैनी सी है और यह सिर्फ तभी महसूस की जा सकती है जब जीवन में एक ठहराव आ जाता है सारे रास्ते बंद हो जाते है सिर्फ खाना और सोना, ना कुछ करे थोड़ा सा हासिल कर लेना, चुनौती और पनौती का ना होना, अपने आप पर शक होने लगे, रोज आईना देखने में डर लगे और पढने लिखने से भी मन उब जाए, समय की घोर कमी के बावजूद अपना समय नष्ट कर अपने आप को नष्ट करने के नित नए बहाने और प्रकल्प खोजे, शाम होते ही साँसे घनघना उठे, दोस्तों से बातचीत में अपना रोना धोना शुरू कर दे, देर रात तक जाग कर रचनात्मकता के बजाय क्षरण के पलों को जीते रहे ये अगर जीवन है तो मंजूर नहीं, लानत है ऐसे जीवन और परिस्थितियों पर और उन सब पर जो घेर कर हमें ऐसी कंदराओ में फेंक देते है कि लो आजाद हो तुम(मन की गाँठे)

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