Friday, September 23, 2011

मन की गांठे

एक ही तरह का काम और वो भी ढंग से नहीं हो पाता किन्ही दूसरों के वजह से, साथ एक ही शहर के मरे हुए लोग जो जिंदगी में कोई परिवर्तन नहीं चाहते, अपने ढर्रे पर खुश और खुद से नाराज, अस्त-व्यस्त, खस्ताहाल और उद्देश्य और लक्ष्य का जीवन में कोई मतलब नहीं, ऐसे में एक रचनात्मक आदमी की सारी ऊर्जा भी लग जाए तो भी कुछ नहीं हो सकता, ऊपर से जिम्मेदारी का बोझ लिए बैठे जिम्मेदार प्रशासनिक लोग बेहद असंवेदनशील और सिर्फ रूपया कमाना जिनका अंतिम उद्देश्य है उनसे क्या अपेक्षा रखे कि वो कुछ करेंगे.सिर्फ ढो रहे है जीवन, बोझ, तनाव, दंश, पीड़ा, उद्दाम वेग से दौडती जिंदगी कहा क्या खो रही है नहीं पता...बस मौत का इंतज़ार है बेसब्री से(मन की गांठे)

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