Saturday, October 8, 2011

मन की गाँठे

हम् दोनों देर रात तक बात करते रहे ना तुम कुछ समझ पाए ना में कुछ कह पाया फ़िर एक सन्देश भेजकर तुम भी सो गए और में भी पढकर सो गया, बाकी बची रही वो खाली बोतलें जो धीमे धीमे खत्म होती रही थी यह जाने बिना कि क्यों वो खोली गयी थी और अब जब सब कुछ साफ़ हो रहा है एक तरफ से तो खैर तुमने ही कहा था ना सो जाओ होना तो यही चाहिए कि हम सुबह या शाम को बात कर ले रात में में भी व्यस्त हो जाता हो और तुम्हे भी तकलीफ होती है और फ़िर देर तक उससे बातें करने के बाद मुझसे बातें करने की ना ताकत बचती होगी ना हिम्मत और फ़िर मेरे फालतू सवाल और अटपटे-उचबक से जवाब....बेहतर है रात खाली रखी जाए और सब कुछ ठीक रहेगा, रात बातचीत "अपनो से ही करना बेहतर होता है".ओह अब समझा कि क्यों आजकल सुबह शाम फोन आते थे इन दिनों............यही सही है ना उसने कहा तो में निरुत्तर हो गया क्या जवाब देता उसे बात तो सोलह आना सच थी, थक चुका था में बेमानी बातो से जिनका कोई ओर था ना छोर और फ़िर क्या मतलब......अब.....जाना भी तो है रैन गुजर रही है कल का सुहाना सूरज बस उग ही रहा है जीवन में........(मन की गाँठे)

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