Sunday, October 16, 2011

मन की गाँठे

उसे लगता था कि वो हमेशा से ही सही रहा था, पता नहीं इस जिद में में वो सबसे लडता-भिड़ता रहा, हर बात में उसे षड्यंत्र नजर आता, जहां वो जाता या छोडता-उसे गडबड नजर आती, कभी कुछ जमता ही नहीं, पकडो छोडो के नाम पर जीवन के इस मुकाम पर आ गया था कि परिवार के नाम बेहद अकेला, दोस्तों के नाम पर खुद से "मोनोलाग", साथ के नाम पर परछाई भी नहीं, विचारधारा के नाम पर घटती-बढती सोच!!! बस एक लंबी सूनी राह पर चलता जा रहा है पता ये सब सही है या चलने दो के नाम पर सब चलता है जैसी सोच, सच के नाम पर झूठ के साथ पेट पालने की मजबूरियां, नौकरी के नाम पर चापलूसी और लेन-देन का दुष्चक्र, विचारधारा के नाम पर रीढविहीन हो जाना, दोस्तों के नाम पर उधारी लेने वाले और सिर्फ काम निकालने वाले, परिजनों के नाम पर रिश्तों की कडुवाहट, साथ के नाम पर पीठ पीछे छुरा भोंकने वाले, संसार एडजस्ट करने वालो का है और वो अपनी शर्तों पर इस कोख से कब्र के सफर को जारी रखना चाहता था.........पर आज यकायक उसने ठान लिया कि वो सब खत्म कर देगा और फ़िर सब खत्म हो जाएगा, वैसे भी उसके रक्त बीज यहाँ थे नहीं-जो पुनः पल्लवित हो और फूले-फलें .......बस खुद को खत्म करके सबको सुख देकर वो चल देगा एक अनंतिम सफर पर, इस अंतिम अरण्य को पार करने में बस चंद लम्हें रह गए है......बहुत उद्दाम वेग से बुला रही है मौत उसे और वो घिसट- घिसट कर उसके पास पंहुच रहा ही है....(मन की गाँठे)

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