Monday, October 31, 2011

ये शायद आवाज़ ही थी जिसने हमें इतने करीब ला दिया और कमोबेश रोज की आदत डाल दी है अब ये कही दूर तक सुनाई नहीं देती तो दौडने लगता हूँ पागलो की तरह, गहरे अँधेरे कुँए से लेकर विशालकाय समुद्र तक और निरभ्र आसमान से लेकर वायु में तैरते बिम्बो तक तुम्हे ढून्ढता हूँ अक्सर .एक बार फ़िर वो चलायमान हो जाए गुंजा दे कण कण को और फ़िर बस.......
ना में झगड रहा था ना तुम बस यूँही ऐसे ही क्या हो गया कि तुम और में दोनों ही अनमने से हो गए जबकि वजह कुछ थी ही नहीं ना है...........ये क्या हो रहा है......और क्यों......दरअसल में दिक्कत कही और है और धूल में लठ्ठ पीट रहे है ..
आवाज के इस जादू को कितना सुनना जरूरी है या गुनना मुझे लगता है कि बस यूँही इस आवाज़ को व्योम तक गूंजने दो शायद तब तक सब ठीक हो जाएगा............

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