Monday, October 31, 2011

तुम तक मेरी आवाज ही नहीं पहुँच रही है

इस शहरे सितमगर में पहले ,मंज़ूर बहुत से कातिल थे !
अब खुद ही मसीहा कातिल है, ये ज़िक्र बराबर होता है !!

- मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद साहब

कहा हो कितने दिनों से आवाज दे रहा हूँ पागलो की तरह इस बीच बाजबहादुर महल, गोलकुंडा, सारे दरबार महल हो आया हूँ.
दूर से नदियों की धार देख ली पर तुम तक मेरी आवाज ही नहीं पहुँच रही है.............कहा हो......


No comments: