Saturday, October 1, 2011

मन की गाँठे

चारों ओर शोर है, रातभर का जागरण है, अन्न से दूर, सिर्फ कुछ ही चीजों पर निर्भर जीवन, एक श्रद्धाभाव, नित अपने आप को चुनौती देना और कुछ कर गुजरने की बेहद कठिन घड़ी में जीवित रख पाना और मसोजकर रह जाना उन सब सांसारिक भावो के लिए जो निम्नतर कर देते है, समर्पण के बाद का सुख और बहुत कुछ पा लेने की आकांक्षा अपने आप से फरेब नहीं तो और क्या है, इस नाट्यशाला के चतुर सुजान यवनिका के पीछे से डोर साधे रखे है और बड़ी निर्ममता से इस जाजम पर नृत्य में पारंगत कठपुतलियो को लगातार नचवा रहे है वे लोग जो जानते है कि शोरगुल भी एक स्थायी भाव है जीवन का--- बस यही से सुनाई नहीं देती सिसकिया, क्रंदन, विलाप और जानता हूँ कि आँसुओ के गिराने की कोई थपताल नहीं होती.......आरोह-अवरोह जारी है जीवन का...और चारों ओर नगाड़े जोरों से बज रहे है(मन की गाँठे)

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