Saturday, October 8, 2011

मन की गाँठे

एक कुआं है और खूब ऊँची ऊँची दीवारें है उसकी, अंदर झांको तो लगता है कि सिर्फ एक घुप्प अन्धेरा है आवाज़ दो तो दूर किसी सतह से टकरा कर लौट जाती है अपने साथ ढेरो आवाजों के साथ जबकि होती एक ही है वो, कही दीखता नहीं है इसका तल, बीच बीच में से झीर बहुत है और पानी तेजी से निकलता रहता है और कुँए की सतह और उठ जाती है पुनः पुनः पानी में उठती है लहरें, हाँ चेहरा नजर जरूर आता है पानी में और कुआं आईना बन् जाता है बहुत बड़ी बड़ी कहानियां है इस कुँए की और हर कहानी में एक नया मोड और नई कहानी है ठीक वैसे जैसे जिंदगी की और एक आवाज के बदले ढेरो आवाजे पर असली आवाज जो सुनना है वो कही नहीं...जिंदगी कुआं है या कुआं जिंदगी, पानी कुआं है या कुआं पानी.......आवाजे जिंदगी है या जिंदगी आवाजें........झीर कही नहीं है जिंदगी में बस गहराई और गहराई है बस तल का पता नहीं........लौट आओ या में जा रहा हूँ कुँए में ....(मन की गाँठे)

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