Tuesday, October 18, 2011

मन की गाँठे

वो सब पीछे छूट गया जो हमारे साथ था हमेशा के लिए, चिपका हुआ था सिकुडती देह से, हर उस जगह से जो मेरी तुम्हारी साँसों की खुशबू से जुडा था, सब कुछ तो छूट गया अपने हिस्से की धूप, अपने हिस्से की रोशनी, अपने हिस्से की ओंस, अपने हिस्से की धूल-धुआं, हवा के वो झोंके जो लंबे झूलों पर सवार होकर नए जगत में ले जाते थे, अपने हिस्से की वे आवाजें जो फूलो के हिलने और पत्तियों की सरसराहट से पैदा होती थी, अपने हिस्से की वो मिट्टी जो जड़ो को बाँध कर रखती थी, बरसात की बूंदें जिनमे से अमृत झार झार बहता था, वो दमकते जुगनू जो टीपटीपाते हुए एक मंद आवाज में जीवन का संगीत सुना जाते थे और उन झींगुरो को पछाड़ देते थे जो रात में जुगनू की लों में बिचरते थे.....आज क्या है बस यही है पीछे छूटा हुआ सब और आनेवाले कल का भयाक्रांत कर देने वाला सच.....कुएँ की उस मुंडेर पर बैठा जीवन की उधेड़ बुन से वाबस्ता सामने फ़ैली विशाल नदी और कालान्तर में महासागर के गर्भ में अपने आपको मिला देने को व्याकुल.........बहुत बेचैनी है, तामस है पर उजास कही नहीं, दिखता कही नहीं कुछ......(मन की गाँठे)

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