Thursday, October 13, 2011

मैं तबाह हो गया- मेरा किस्सा खत्म हो गया

‎"मैं तो अपनी आत्मा को भी शराब में घोलकर पी गया हूं, बाबा! मैं कहीं का नहीं रहा; मैं तबाह हो गया- मेरा किस्सा खत्म हो गया, बाबा! लोग किसलिए इस दुनिया में जीते हैं?"

"लोग दुनिया को बेहतर बनाने के लिए जीते हैं, प्यारे. उदाहरण के लिए एक से एक बढई हैं दुनिया में, सभी दो कौडी के... फिर एक दिन उनमें ऐसा बढई पैदा होता है, जिसकी बराबरी का कोई बढई दुनिया में पहले हुआ ही नहीं था- सबसे बढ-चढ कर, जिसका कोई जवाब नहीं... और वह बढइयों के सारे काम को एक निखार दे देता है और बढइयों का धंधा एक ही छलांग में बीस साल आगे पहुंच जाता है... दूसरों के मामले में भी ऐसा ही होता है... लुहारों में, मोचियों में, किसानों में... यहां तक कि शराबियों में भी!"

----- मक्सिम गोर्की, नाटक 'तलछट'(वाया सागर शेख)

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