Thursday, October 20, 2011

मन की गाँठे

रात नींद तो आई नहीं हाँ नींद जैसी कुछ बात जरूर थी जो देर आँखों में तैरती रही फ़िर अचानक सी कही गायब हो गयी लगा कि कुछ दरक रहा है कही कुछ छूट रहा है और फ़िर आहिस्ता आहिस्ता सब कुछ शांत हो गया- दिमाग का मवाद, ज्वर, संताप, यातना, अन्धेरा, कोलाहल, सिसकियाँ, अबोले स्वर, झींगुरों की आवाजे, आरोह-अवरोह और आर्तनाद --सब कुछ शांत हो गया एक ही झटके में.....दूर कही सन्नाटे में एक बांसुरी का स्वर् सुनाई दे रहा था, एक मूर्ति अँधेरे में दैदीप्त्मान सी चमक रही थी उसकी आभा और प्रभामंडल में खिचती सी चली गयी रात की खामोशियाँ और फ़िर लगा कि एक गजब का चुम्बकीय खिचाव है उसमे.....बस रात अपने डेने फैलाए पहुँच गयी थी पुरे साजो सामान के साथ...और यही से शुरू हुआ एक नया सफर, एक लंबी चौड़ी सुरंग से बाहर आने का जोखिम भरा सफर और फ़िर सब कुछ धीरे धीरे जाग्रत सा, धूमिल सा चला आया, एक किरण नजर आ रही है- आ रही है वो इसी तरफ आ रही है देखो देखो.....(मन की गाँठे)

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