Tuesday, October 4, 2011

मन की गाँठे

ये जीवन की ढली हुई एक शाम है और पता नहीं कब कहा से खुरचनो सी, रेंगती हुई चली आई है स्मृतियाँ और पूछ रही हिसाब बीते कल का, पूछ रही है कल के पलों का, में ओचक सा खडा दिग्भ्रमित हूँ और इस विचित्र सी स्थिति में अपने आप को बहुत ही कष्टकर पा रहा हूँ ज्वर उमड़ रहा है उद्दाम वेग से आती जाती भावनाओं को अलभ्य पाकर बौना महसूस कर रहा हूँ .....अब समय ही नहीं है जिंदगी के हिसाब तो पुरे हो गए है और नफ़ा नुकसान तो इतने है कि इससे ज्यादा बर्बादी और हो ही नहीं सकती बस उहापोह में उलझा और अपने आप को अपने आप से छुपाता और लगभग दबोचता हुआ सा चला जा रहा हूँ इस सुरंग में कोई है जो पीछा कर रहा है, कोई है जो पुकार रहा है, कोई है जो उस मुहाने पर निरभ्र आसमान की उम्मीद जगा रहा है, कोई है जो नींद में सुलाकर सब कुछ छीन लेना चाहता है, कोई है जो मेरे से मुझको छुडा लेना चाहता है, कोई है जो सिर्फ मुझे तुमसे अलग करना चाहता है..(मन की गाँठे)

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