Friday, October 21, 2011

मन की गाँठे

बड़ी दुविधा में हूँ कहा तो यह था कि आ जाना, कहा तो यह भी था कि यही रुक जाना, कहा तो यह भी था कि अब मेरा कोई भरोसा नहीं है फ़िर आनेवाले दस पन्द्रह बरस किसने देखे है, बाहर जानेपर कोई लौटता नहीं है, और वो इसीलिए तो मेरे साथ आने को तत्पर है कि लौटना तो होगा नहीं फ़िर तुम, ये, वो, सब कुछ यही छूट जाएगा, होता है और कोई ये नई बात तो है नहीं, इंसानी सभ्यता में में कोई अकेला तो रहूंगा नहीं जो जाकर ना लौटूं या आना भी होगा तो बहुत से बहुत दो तीन साल में एकाध बार, और फ़िर वो दस पन्द्रह दिन तो मेरे लिए होंगे ना-- ना कि तुम्हारे लिए, इतना बड़ा कुनबा हो जाएगा दोस्तों यारों और रिश्तेदारों का कि मुझे नहीं लगता कि तुम्हारे लिए समय निकाल भी पाउँगा, बेहतर है यही सही समय है जब कोई होगा नहीं तुम्हारी भी तमन्ना पूरी हो जायेगी, थोड़ा सा साथ रह लेंगे, घूम लेंगे और कुछ छोटी मोटी खरीददारी भी कर लेंगे, हालांकि पैसे तो है नहीं, फ़िर भी देखेंगे-वैसे भी तुम ही करोगे खर्च मुझे पता है....खैर बोलो ना आ रहे हो क्या, दरअसल में फ़िर मुझे प्लान करना पडेगा शायद हवाई जहाज से एक राउंड में वहाँ हो आऊ, तुम आ जाते तो एक झंझट खत्म हो जाता वरना हमेशा के लिए कहते रहोगे कि....दीवाली साथ नहीं मना पाए..(मन की गाँठे)

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