Sunday, October 16, 2011

मन की गाँठे

सबसे नाराजी लेना शगल बन् गया है दोस्त हो या नातेदार, जिंदगी हो या उम्मीद, शायद यही सही है कि उसके जाने से उपजे शून्य को एक नाराजगी भर दे, कही कोई खाली स्थान नहीं रहना चाहिए.......सिखाया तो ये गया था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है सबसे काम पडता है, मिलजुलकर रहना चाहिए...और लगभग यही तो वो करता आया था गत चालीस बरसों में - जब से होश सम्हाला था सबके साथ हिल मिलकर रहने की ही कोशिश कर रहा था लगातार इसके लिए अपने आपको कितनी बार मारना पडा था जूझना पड़ा था अपने वजूद से अपनी सोच से कि वो समझौते नहीं करता पर सीखे हुए ज्ञान को परखना भी था और लोगो की भीड़ में अपनी अस्मिता बनाकर भी रहना था, पर ना वो लोगो में रह पाया, ना अपने आप को बना पाया, टूटता रहा लगातार और फ़िर एक दिन अचानक भुर्र से बिखर गया, जब उसके अपने किसी ने कह दिया कि यह सब क्या पागलपन है और भाड में जाओ तुम और तुम्हारे काम- धाम, ख्वाब, और विचार .बस सन्न सा रह गया था बस यही देखना था अब उसे इस उम्र में..... अब कोई रंजो गम नहीं है अपने आप से भी, सब खत्म हो गया है जब उसका अपना ही कोई छूट जाए तो ऐसे जीने से क्या.........बस...वो चल दिया.......एक क्षितिज की ओर हमेशा के लिए....(मन की गाँठे)

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