Monday, October 31, 2011

अबोला तो था नहीं पर एक चौमासा हो गया है कि कही से सहजता आती ही नहीं है और मौसम की मार बार बार पडने लगती है.............कितना पानी गिर चुका और अब तो सुबह सुबह ओंस की बूंदें भी याद दिला जाती है कि हम तो भूल ही गए है आँखों की कोरो से भी लगभग ऐसी ही धार निकल पडती है जब किसी फूल को खिलते हुए देखकर गिरते हुए देख लेता हूँ या उस तितली को देखकर जो घूम घूम कर मधु तो ले जाती है पर इन ओंस की बूंदों के समय तक नहीं पंहुच पाती........बस फिजां में एक सुरसुरी है और फ़िर लग रहा है कि हवाएं फ़िर से पूरब की ओर बहने लगी है....

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