Saturday, October 1, 2011

इस पानी के विस्तार में गहराई तो है, उन्मुक्तता भी, स्वछन्द भी है विचरने को पर बाँध दिया है इस पानी को ताकि दोहन किया जा सके और वहाँ ढाला जा सके धकेला जा सके जहां जरूरत है जैसे जन्म के समय हम सब थे स्वछन्द उन्मुक्त और खुले खुले से पर बाद में एक बागड में धकेल दिए गए मूल्य, संस्कार और मर्यादाओं की चौहद्दी में और कहा लो तुम अब आज़ाद हो!!! अब हम भी ऐसे ही बंधे है चारों ओर से अपने अपने दायरो में घूम रहे है एक घिन्नी की तरह और वो सब पा लेना चाहते है जो इस घेरे में मिल ही नहीं सकता, इस चक्कर घिन्नी में गोल गोल है सब, मंद थाप पर चहकते हम बेचैन है कि कब मुक्त होंगे इस माया से और संजाल से कि इन दीवारों को, सीमाओं को तोडकर फांद जाए ये बंधन और फ़िर कहे एक बार जोर से चिल्लाकर कि आज में सच में आज़ाद हूँ..........(मन की गाँठे)

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