Saturday, October 1, 2011

मन की गाँठे

एक सुबह और हो गयी और वही सब है चारों ओर उसी सूरज का तेज, पक्षियों का कलरव, हवा की बाट जोहते पेडो के पत्ते, आसमान की ओर बढ़ते पेड़, ओंस की बुँदे यहाँ वहा, सूनी सड़क मानो इंतज़ार में इसकी उम्र ही गुजर गयी है, दूर से आती रेल की आवाज जो पता नहीं कब से कहा आ-जा रही है और किन्हें क्यों कहा ले जा रही है जब सब एक दिन खत्म होना है तो कही जाने की जरूरत क्या है और किस भीड़ का हिस्सा होते जा रहे है इस सफर में, शुष्क पटरियां कांपने लगती है दूर से आवाज सुनकर, इस सुबह की कभी दोपहर होती है कभी शाम और आख़िरी में रात यह कब तक चलेगा इस दुष्चक्र को रोकना होगा और फ़िर देखना होगा, हाफते हुए, सुस्ताते हुए सोचना होगा कि इस सुबह को या तो रोक दिया जाए या इस सारे क्रम को उलट दिया जाए, मन के कुलान्चो की कोई सीमा नहीं, पगला है रे....!!!(मन की गाँठे)

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