Tuesday, October 18, 2011

मन की गाँठे

कल रात एक सपना देखा जिसमे जीवन था और सब कुछ वैसा ही हो रहा था जैसा हम सोचते है......वो सब उमंगें पूरी हो रही थी और स्वप्न जीवन की वास्तविकता में बदल रहे थे, कुछ भी ऐसा नहीं था कि सोचा और पूरा ना.....दोस्त-यार, परिजन सब खुशहाल, हर तरफ माहौल में एक जीवन्तता और उत्साह, हंसी मानो बिखरी पडी हो और पूछ रही हो कि किसके चेहरे पर बिखरना है और वैभव ढून्ढ रहा हो कि कहा जाकर अपने सौगातो की बरसात कर दू , ना दुश्चिंताएं -ना दुख्स्वप्न, शब्दकोष को पुनः परिभाषित किया गया और उन सारे शब्दों को हकाल कर बाहर कर दिया जो वजूद को अप्रियकर बनाते है, इतनी खुशिया कि जीवन छोटा पडने लगा समेटने में तो जीवन की भी डोर लंबी कर दी गयी !!! सुखद है ऐसा स्वप्न, भोर का स्वप्न, जीवन का स्वप्न, एक लंबे मार्ग पर चलने के लिए कष्टों के बीच का जाग्रत स्वप्न, अंधेरी रात में बेचैन होकर टकराते हुए मौत के अंदेशो के बीच एक सुनहरे कल का स्वप्न और सबसे ज्यादा अपने आप को ज़िंदा रखने के लिए मुगालते का स्वप्न......(मन की गाँठे)

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