Monday, October 24, 2011

मेरी मां अब ढेरों मन मिट्टी के नीचे सोती है

अख़्तरुल ईमान की यह नज़्म मुझे बेहद पसंद है. इसका उन्‍वान है 'तहलील' यानी अंत:विश्‍लेषण. लिप्‍यंतर एक बहुत ही प्‍यारे शायर फ़ज़ल ताबिश ने किया था.

मेरी मां अब मिट्टी के ढेर के नीचे सोती है
उसके जुमले, उसकी बातों,
जब वह जि़ंदा थी, कितना बरहम (ग़ुस्सा) करती थी
मेरी रोशन तबई (उदारता), उसकी जहालत
हम दोनों के बीच एक दीवार थी जैसे

'रात को ख़ुशबू का झोंका आए, जि़क्र न करना
पीरों की सवारी जाती है'
'दिन में बगूलों की ज़द में मत आना
साये का असर हो जाता है'
'बारिश-पानी में घर से बाहर जाना तो चौकस रहना
बिजली गिर पड़ती है- तू पहलौटी का बेटा है'

जब तू मेरे पेट में था, मैंने एक सपना देखा था-
तेरी उम्र बड़ी लंबी है
लोग मोहब्बत करके भी तुझसे डरते रहेंगे

मेरी मां अब ढेरों मन मिट्टी के नीचे सोती है
सांप से मैं बेहद ख़ाहिफ़ हूं
मां की बातों से घबराकर मैंने अपना सारा ज़हर उगल डाला है
लेकिन जब से सबको मालूम हुआ है मेरे अंदर कोई ज़हर नहीं है
अक्सर लोग मुझे अहमक कहते हैं.

No comments: