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जगजीत की विदाई पर फेसबुक पर दोस्तों की भावनाएं........


जगजीत सिंह का गाया हुआ निदा फाजली की कुछ पंक्तियाँ :

जाने वालों से राब्ता रखना
दोस्तों, रस्मे- फातहा रखना
घर की तामीर चाहे जैसी हो
इसमें रोने की कुछ जगह रखना
जिन को हासिल नहीं वो जान देते रहतें हैं ,
जिन को मिल जाऊं वो सस्ता समझनें लगतें हैं ......!
जाने वो कौन सा देश जहां तुम चले गए!
जिंदगीभर दुनिया के साथ ग़म के समंदर में गोता लगाने वाले जगजीत आज वो समंदर हमारे हवाले कर गए। श्रद्धांजलि।
...कहां तुम चले गए?

जिनके दिल में है दर्द दुनिया का, वही दुनिया में जिंदा रहते हैं,
जो मिटाते हैं खुद को जीते जी, वही मरकर भी जिंदा रहते हैं।
रियाज़ खैराबादी

कहाँ मखाने का दरवाजा ग़ालिब और कहाँ वाइज
पर इतना जानते थे कल वो जाता था के हम निकले
निकलना खुल्द से आदम का सुनते आए है लेकिन
बहुत बे आबरू होकर तेरे कुचे से हम निकले
मोहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का
उसी को देखकर जीते है जिस काफिर पे दम निकले

ग़ज़ल को दरबारों और बड़े लोगों की महफ़िलों से निकाल कर आम लोगों के बीच लोकप्रिय बनाने का श्रेय जगजीत सिंह को जाता है

उनके हाथ से सम्मान मिला था पिछले बरस और मेमेंटो लेते लेते उनके हाथ को स्पर्श कर लिया था.लगा क़ायनात में फ़ैली ग़ज़ल की ख़ुशबू मुझमें समा गई...
उनके हाथ से सम्मान मिला था पिछले बरस और मेमेंटो लेते लेते उनके हाथ को स्पर्श कर लिया था.लगा क़ायनात में फ़ैली ग़ज़ल की ख़ुशबू मुझमें समा गई..." ft="{"type":41}">

कल शरद पूर्णिमा है और आज एक शख्स हमें अपनी आवाज के साथ छोड़ कर चला गया। उन्हीं के शब्दों में उन्हीं की याद- कल शरद पूर्णिमा है और आज एक शख्स हमें अपनी आवाज के साथ छोड़ कर चला गया। उन्हीं के शब्दों में उन्हीं की याद-
कभी यूँ भी तो हो/दरिया का साहिल हो/पूरे चाँद की रात हो /और तुम आओ/कभी यूँ भी तो हो/परियों की महफ़िल हो/कोई तुम्हारी बात हो/और तुम आओ'

कला,संगीत और साहित्य की सहज उपलब्धता भी एक तरह से लोकतांत्रिक माहौल पैदा करती है,ये अलग बात है कि अगर उसमें सिर्फ बाजार और मुनाफे की नीयत शामिल हो जाए तो किसी दूसरे उत्पाद से ज्यादा खतरनाक असर छोड़ती है। जगजीत की इस सहज उपबल्धता ने गजलों के भीतर यही काम किया। सबके सुनने कि लिए समर्थ (आर्थिक और पहुंच के स्तर पर) न होने की स्थिति में इनकी सत्ता अलोकतांत्रिक हो जाती है। गजलों और शास्त्रीय संगीत की दुनिया में यही हुआ जिसे कि जगजीत सिंह ने काफी हद तक तोड़ने की कोशिश की।
"..Mujhko lauta do, bachpan ka saawan..
Woh kaagaz ki kashti.. woh baarish ka paani.."
God Bless the legend's soul!! ..

जगजीत सिंह ने हम जैसे फटीचर हिन्दी गानों में इजहार के शब्द ढूंढनेवालों को बताया कि गजल सुनने,गाने और पसंद करनेवाले लोग भी इसी ग्रह के लोग होते हैं और हमारे बीच के लोग होते हैं। गजलों को लेकर जो इलीटिसिज्म रहा है और सिर्फ सुननेभर से निम्न और उच्च संस्कृति के बीच विभाजन पैदा हो जाते हैं,जगजीत सिंह ने इस विभाजन को खत्म किया है। उन्होंने इसे एक पॉपुलर जार्गन के तौर पर लोगों के सामने रखा। यही कारण है कि अटरिया पर लोटन कबूतर रे सुननेवाले लोग भी जगजीत सिंह को पसंद करते आए हैं और वो गुलाम अली के श्रोताओं की तरह दंभ नहीं रखते।

‎(कुछ सदाएं.......पसेमर्ग भी आवाज़ देती हैं.....ऐसी ही एक जाविदाँ आवाज़ के नाम.....)

सारी महफ़िलें, आराइशें ले गया कोई,
अब न लौटेंगे कभी, ये कह गया कोई
आबाद रहे ऐ दोस्तों महफ़िलें तुम्हारी,
जाते-जाते भी ये दुआ दे गया कोई.

तुझसे बाबस्ता हैं
कितनी ही रातें मेरी
तूने पोछे हैं
कितने ही आँसू मेरे
जब कभी टूट के चाहा है रोना मैंने
तूने थामा है कंधे पे सर को मेरे
कितनी बातों की गवाही हैं तेरी गज़लें
कितने ही चाक जिगर सिली हैं तेरी नज़्में
मेरे हमदम;
मेरे हमराज़;
तुझे माफ नहीं कर सकता
आज तू लौट गया
और बताया भी नहीं........
तुझसे बाबस्ता हैं कितनी ही रातें मेरी तूने पोछे हैं कितने ही आँसू मेरे जब कभी टूट के चाहा है रोना मैंने तूने थामा है कंधे पे सर को मेरे कितनी बातों की गवाही हैं तेरी गज़लें कितने ही चाक जिगर सिली हैं तेरी नज़्में मेरे हमदम; मेरे हमराज़; तुझे माफ नहीं कर सकता आज तू लौट गया और बताया भी नहीं........" ft="{"type":41}">

सफर में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो। सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो।...
(लोगों को जीने की कला/जीवन की खूबसूरत से रूबरू कराने वाले गायक जगजीतसिंह को श्रृद्धांजली। )

जगजीत सिंह हमें इसलिए पसंद आते रहे क्योंकि इनको सुनने से हमारे भीतर गजल सुनने की न तो कभी अकड़ पैदा हुई और न ही टटपूंजिए टाइप की नज्में सुनने की कुंठा ही पनपने पायी। इन दोनों बातों से मुक्त होकर कुछ भी सुनना,देखना एक दुर्लभ संस्कृति का हिस्सा है जिसे की हम आज के तेजी से पनपते माध्यमों के बीच शायद ही आसानी से खोज पाएं।

ग़ज़लों के बादशाह ---मिल जाए तो मिटटी है ,ना मिले तो सोना है...दुनिया जिसे कहते हैं .....श्रद्धांजलि !

जग ने छीना मुझसे , मुझे जो भी लगा प्यारा...............

जगजीत सिंह का यूँ चले जाना बहुत उदास करता है. खासकर ऐसे दौर मैं जब संगीत की तासीर के प्रति लोगों को असंवेदनशील बनाने की बाजारू साजिशें जारी हों और संगीत जगत को वाहियात आवाजों ने हाइजेक कर लिया हो तब ऐसे कलाकार का जाना हर संवेदनशील व्यक्ति जो संगीत से थोडा भी लगाव रखता हो उसको परेशां करेगा ही. गुलज़ार के टी. व़ी. सीरियल मिर्ज़ा ग़ालिब या अली सरदार ज़ाफरी का कहकशां इनमे जगजीत सिंह ने महान शायरों की नज्मों और ग़ज़लों को जिस अंदाज़ मैं गया है वह हमेशा अविस्मरनीय रहेगा. दुःख की बात इससे भी ज्यादा ये है की हमारा समाज शायद अब सहगल साहिब, इकबाल बनो, लता जी , आशा जी , बेगम अख्तर, मुहम्मद रफ़ी जैसी तमाम पाक आवाज़ों का होना ज़रूरी नहीं मानता पर इन आवाजों के स्थान पर संगीत मैं जो नई स्थापनाएं दी जा रहें हैं क्या उन्हें आम लोगों के ह्रदय या जीवन की आवाज़ या ध्वनी मन जा सकता है......यकीनन नहीं. फिर ऐसे ख़ाली होते वक़्त मैं आम आदमी दिल मैं कौन सी आवाज़ का घर बनाये वो क्या गुनगुनाये .........?

इक आह भरी होगी
हमने ना सुनी होगी
जाते जाते तुमने आवाज तो दी होगी.............

आवाज़ जिंदा है -धीरज कुमार

by Dheeraj Kumar on Monday, 10 October 2011 at 22:07

एक श्रधांजलि जगजीत सिंह के लिए -

आज सच में ऐसा लगा रहा है जैसे मैंने कुछ खो दिया है और मैं अनाथ सा हो गया हूँ. आज जगजीत सिंह का निधन हो गया और लगता है कोई अपना नहीं रहा हो. वो सच में मेरे अपने थे क्यूंकि आज मैं जो भी लिखता हूँ उसमे जगजीत सिंह जी और मेरी तन्हाई का ही हाथ है. मेरी तन्हाई तो मेरे साथ रही पर वो चले गए. पर वो कही नहीं गए मुझ जैसे, आपके जैसे लाखों लोगों के दिलों में हैं और हमेशा रहेंगे.

यूँ लग रहा है जैसे सब ख़त्म हो गया हो,

जैसे दिल की बस्ती वीरान हो गयी हो.

मन का हर कोना खली-खली सा हो गया,

और रगों में दौड़ते लहू जम गए हों.

सपनो के खंडहर मैं अकेला ही रह गया हूँ,

अभी -अभी हवा का एक झोंका उसे उड़ा ले गयी.

आँखें पत्थरा गयी हैं और नसें ठंडी हो चुकी हों ,

जैसे अभी किसी सपने से आँख खुली हो.

पर उसका तिलिस्म कुछ ऐसा था कि,

रगों में घर बना लिया हो जैसे किसी ने.

जैसे साँसों से उसकी खुशबु आती हो,

दिल की हर धड़कन बस उसका नाम लेती है.

अभी-अभी तुम यही थे ,अभी तुम कहाँ गए,

सब कहते हैं तुम अब नहीं रहोगे मेरे पास.

सब तो पागल हैं पागलपन सिखाते हैं,

पर 'जगजीत' ऐसा कैसे हो सकता है.

कैसे तुम यूँ अकेले-अकेले निकल जाओगे,

और मुझे छोड़ जाओगे यूँ ही तन्हा तुम.

तुम्हे कुछ याद भी है क्या नहीं न शायद भूल गए,

जब मैंने कलम उठाई थी जीने के लिए.

कुछ शब्द उकेरे थे मैंने कोरे कागज़ पर,

तुमने और मेरी तन्हाई ने तो मुझे लिखना सिखाया था.

जब मेरी तन्हाई ने मुझे तन्हा नहीं किया 'जगजीत',

तुम कैसे मुझे अकेले छोड़ जा सकते हो.

'जगजीत' तुम तो हमेशा मेरे साथ रहोगे ,

तुम्हारी आवाज़ ने ही मुझे जीने की शक्ति दी है.

जब भी राह में थकता हूँ और गिरने को होता हूँ,

तेरी आवाज़ ही थामकर मुझे जीने का सहारा देती है.

तुम कहीं विलुप्त नहीं हुए हो यार ,

बस वो जिस्म जिसे दुनिया देखती थी.

सबकी नज़रों से ओझल हो गया है,

और अपनी आवाज़ में जा बसे हो तुम.

कभी खामोश बैठोगे कभी कुछ गुनगुनाओगे
में उतना याद आउंगा मुझे जितना भुलाओगे...........
जगजीत सिंह के हिन्दी में गजल के योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा.......वो सिर्फ एक गायक ही नहीं बल्कि बेहतरीन शख्स थे, विश्व ने एक प्यारा इंसान पुनः खो दिया यह सब यकायक होने जैसा नहीं था............भावपूर्ण श्रद्धांजलि Sandip Naik Sam

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