Tuesday, November 1, 2011

ये तो होना ही था आज या कल फ़िर तुम ऐसा क्यों कह रहे थे मुझे, लगा जैसे किसी खोह से निकल रही मेरी आवाज़ और तुम दूर खड़े उस सुरंग के किनारे पर जहां से सूरज की किरणे साफ़ साफ़ तुम्हारे चेहरे पर पड रही है और गौर वर्ण चेहरा धूप की रोशनी में नहा कर तेजोमय हो रहा हो, फ़िर भी ऐसा लगा कि मेरी आवाज़ तुम तक पहुँच नहीं पा रही है कंदराओ में घिरा में तक रहा हूँ और सुनाने की कोशिश करता हुआ हर बार की तरह नाकाम, असफल और बेजार सा......क्षण क्षण झरता हूँ अपनी ही देह से बिछुड़ता हुआ पल पल....बस........अब यही बाकी है मेरे पास.......सन्नाटे में गूंजता हुआ तुम्हारा छंद......

No comments: